
वंदे मातरम को इस्लाम विरोधी क्यों कहा गया?
भारत का गीत *“वंदे मातरम”* स्वतंत्रता संग्राम के समय राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बना। इसे देशभक्ति के गीत के रूप में गाया गया और लोगों ने इसे “माँ भारत” के रूप में अपनाया। इसमें भारत माता को देवी के रूप में दिखाया गया है और कुछ छंदों में देवी‑देवताओं का जिक्र भी है। यही वजह है कि यह गीत आज भी विवादों में रहता है।
“वंदे मातरम” का हिंदी में अर्थ है “मैं मातृभूमि की वंदना करता हूँ“ या “मां, मैं आपको नमन करता हूँ”। यह दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है: ‘वंदे’ (वंदना करना, नमन करना) और ‘मातरम्’ (मां)।
कुछ मुस्लिम समुदाय और धर्मगुरु मानते हैं कि इस्लाम में केवल *अल्लाह की पूजा* मान्य है और किसी अन्य देवी‑देवता या मानव रूपक की वंदना करना उनके धर्म के खिलाफ है। इसीलिए कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसे गाने या अनिवार्य बनाने का विरोध किया है। उनका कहना है कि अगर इसे “पूजा” या धार्मिक अनुष्ठान की तरह लिया जाएगा तो यह इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। हालांकि, मुस्लिम विचारकों में यह भी राय है कि अगर इसे केवल राष्ट्र‑भक्ति के नजरिए से देखा जाए और पूजा की तरह नहीं लिया जाए, तो इसे गाया जा सकता है।
आजकल यह विवाद फिर से चर्चा में आया क्योंकि कई राज्यों के स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों से इसे गाने के लिए कहा गया। इससे मुस्लिम समुदाय में असंतोष और बहस शुरू हो गई। कुछ धार्मिक संगठन इसे लागू करने के आदेश को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री *योगी आदित्यनाथ* ने इस पर कहा कि *वंदे मातरम केवल राष्ट्रभक्ति का प्रतीक* है और इसे लेकर बहस करने की जरूरत नहीं है। उनका कहना है कि इसे गाना या सुनाना किसी समुदाय को नीचा दिखाने वाला नहीं है। वे मानते हैं कि देशभक्ति के प्रतीक पर विवाद करना देश के हित में नहीं है।
इस विवाद की वजह से समाज में एक बड़ी बहस छिड़ गई है। कुछ लोग इसे *राष्ट्रीय एकता का प्रतीक* मानते हैं, जबकि कुछ इसे *धार्मिक स्वतंत्रता* के सवाल के रूप में देखते हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर कई बार सुनवाई कर चुका है और पूछा है कि आखिर क्यों इसे राष्ट्रीय गान के बराबर महत्व नहीं दिया गया।

इस्लाम का नजरिया: इस्लाम कहता है कि अल्लाह के अलावा किसी अन्य देवता या शक्ति की पूजा करना सही नहीं है। इसलिए कुछ मुस्लिम समुदाय के लोग “माँ भारत” को वंदन करना इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ मानते हैं। लेकिन साथ ही, अगर इसे केवल *देशभक्ति और मातृभूमि के प्रेम* के नजरिए से देखा जाए और पूजा की तरह न लिया जाए, तो इसे गाना इस्लाम के खिलाफ नहीं माना जाता। इस तरह यह एक संतुलन का मुद्दा बन जाता है — देशभक्ति के प्रतीक को अपनाना और धार्मिक सिद्धांतों का सम्मान करना।
कुल मिलाकर, *“वंदे मातरम” आज सिर्फ एक गीत नहीं रह गया है।* यह राष्ट्रभक्ति, धार्मिक भावनाओं, राजनीति और समाज में संवेदनशील मुद्दों का केंद्र बन गया है। यह गीत लोगों में मातृभूमि के प्रति प्रेम जगाता है, लेकिन यह सवाल भी खड़ा करता है कि भारत में सभी धर्म और समुदायों की भावनाओं का सम्मान कैसे किया जाए। आने वाले समय में यह बहस और चलती रहेगी, और लोगों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती बनी रहेगी