
बांग्लादेश में फिर बवाल!
बांग्लादेश: बांग्लादेश में गुरुवार को ज़िंदगी एक बार फिर ठहर-सी गई। राजधानी ढाका से लेकर चिटगांव, सिलहट और खुलना तक सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा। दुकानें बंद, यातायात ठप और सुरक्षा बलों की गश्त हर मोड़ पर दिखाई दी। कारण था बर्खास्त प्रधानमंत्री *शेख हसीना* और उनकी पार्टी *आवामी लीग* का आह्वान किया गया देशव्यापी “लॉकडाउन”। यह विरोध उस मुकदमे के खिलाफ है, जिसमें हसीना पर पिछले साल के छात्र आंदोलन में सैकड़ों लोगों की मौत के लिए मानवता के खिलाफ अपराध (Crimes Against Humanity) का आरोप लगाया गया है।

इस घटना की जड़ें 2024 के मध्य में हुए उस बड़े *छात्र आंदोलन* में हैं, जिसने बांग्लादेश की राजनीति को हिला कर रख दिया था। आंदोलन की शुरुआत सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति और बेरोजगारी के विरोध से हुई थी, लेकिन जल्द ही यह आंदोलन भ्रष्टाचार, तानाशाही और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ एक जन-आक्रोश में बदल गया। हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए, सरकार से जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग करने लगे। प्रदर्शन इतने बड़े स्तर पर पहुंच गए कि पुलिस और सेना को मोर्चा संभालना पड़ा। प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज हुआ, आँसू गैस छोड़े गए और कई जगह गोली चलने की घटनाएँ भी सामने आईं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हिंसा में *400 से अधिक लोगों की मौत* हुई, जबकि हजारों घायल हुए। उस समय हसीना सरकार ने इसे “अराजक तत्वों की साज़िश” बताया था, लेकिन देश और विदेश दोनों जगहों से मानवाधिकार हनन के गंभीर आरोप लगे।

2025 में जब सत्ता परिवर्तन हुआ और एक *अंतरिम सरकार* ने बांग्लादेश की बागडोर संभाली, तो कई पुराने मामलों की दोबारा जांच शुरू की गई। इन्हीं में से सबसे प्रमुख केस था — छात्र आंदोलन दमन में हसीना की भूमिका। अदालत ने हसीना के खिलाफ “मानवता के खिलाफ अपराध” के तहत मुकदमा दर्ज करने की अनुमति दी। इस फैसले के बाद हसीना को गिरफ्तार कर लिया गया और ढाका की एक उच्च सुरक्षा जेल में रखा गया है।
हसीना के समर्थक इस मुकदमे को *राजनीतिक बदले की कार्रवाई* करार दे रहे हैं। उनका कहना है कि विपक्ष और सेना समर्थित अंतरिम प्रशासन ने हसीना को पूरी तरह खत्म करने की साज़िश रची है। आवामी लीग का कहना है कि यह न्याय नहीं, बल्कि प्रतिशोध है। पार्टी नेताओं ने दावा किया कि हसीना ने हमेशा देश के विकास और स्थिरता के लिए काम किया है, लेकिन अब उन्हें साज़िश के तहत फंसाया जा रहा है। इसी विरोध को लेकर गुरुवार को देशव्यापी “लॉकडाउन” का आह्वान किया गया, जिसमें पार्टी के हजारों कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए।
सुबह से ही ढाका की सड़कों पर तनाव का माहौल था। परिवहन सेवाएँ पूरी तरह ठप हो गईं, स्कूल और कॉलेज बंद रहे। सेंट्रल ढाका, मिर्पुर और मोटिजील जैसे इलाकों में प्रदर्शनकारियों ने सड़कें जाम कर दीं। उन्होंने टायर जलाए, पुलिस के खिलाफ नारेबाज़ी की और “हसीना के लिए न्याय” की मांग की। कई जगह पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। आँसू गैस के गोले छोड़े गए, लाठीचार्ज हुआ और रिपोर्ट्स के मुताबिक सैकड़ों लोग हिरासत में लिए गए।
वहीं प्रशासन का कहना है कि ये प्रदर्शन न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश हैं। अंतरिम सरकार ने बयान जारी कर कहा कि अदालत पूरी तरह स्वतंत्र है और किसी पर कोई दबाव नहीं है। “कानून से ऊपर कोई नहीं,” सरकार के प्रवक्ता ने कहा। “यह मुकदमा बांग्लादेश के न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय है जहाँ जवाबदेही तय होगी।” प्रशासन ने इंटरनेट सेवाएँ सीमित कर दी हैं ताकि अफवाहें न फैलें, और सोशल मीडिया पोस्ट्स पर निगरानी बढ़ाई गई है।
हालाँकि, हसीना के वकीलों का कहना है कि उनके खिलाफ पेश किए गए सबूत कमजोर हैं। उन्होंने कहा कि उस समय की हिंसा की जिम्मेदारी केवल सरकार पर नहीं, बल्कि विरोधी समूहों और चरमपंथी संगठनों पर भी थी, जिन्होंने आंदोलन को भटकाया। हसीना ने अपने वकीलों के ज़रिए बयान जारी किया —
> “मैंने हमेशा अपने देश के लिए काम किया है, गरीबी हटाई, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार किया। अब मुझे झूठे आरोपों में फँसाकर मेरी छवि खराब की जा रही है।”
इस बयान ने उनके समर्थकों में नया जोश भर दिया। ढाका यूनिवर्सिटी और जेसोर में छात्रों ने रैलियाँ निकालीं और कहा कि अगर हसीना को सज़ा दी गई तो वे “देशव्यापी आंदोलन” करेंगे।
वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि आवामी लीग की यह प्रतिक्रिया देश में अराजकता फैलाने की कोशिश है। बीएनपी और अन्य दलों ने कहा कि “अगर कोई दोषी है, तो उसे सज़ा मिलनी चाहिए, चाहे वह पूर्व प्रधानमंत्री ही क्यों न हों।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हसीना शासन के दौरान कई राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाला गया, मीडिया पर नियंत्रण रखा गया और लोकतंत्र को दबाया गया।
ढाका और अन्य शहरों में तनाव बढ़ने के बाद संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने चिंता जताई है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) ने कहा है कि बांग्लादेश को न्यायिक प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखना चाहिए। अमेरिका ने बयान जारी कर कहा कि “कानून का राज और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा” ज़रूरी है, लेकिन किसी भी तरह की हिंसा या बदले की कार्रवाई अस्वीकार्य है। भारत ने भी शांति की अपील करते हुए कहा कि वह पड़ोसी देश की स्थिति पर करीबी नज़र रखे हुए है।
गुरुवार की शाम तक कई जिलों में धारा 144 लागू कर दी गई। इंटरनेट स्पीड घटाई गई, और ढाका एयरपोर्ट पर अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए। कई जगह स्थानीय मीडिया की कवरेज पर भी रोक की खबरें आईं। अंतरिम सरकार का कहना है कि यह सब “राष्ट्रीय सुरक्षा” के मद्देनज़र किया गया है, लेकिन आवामी लीग ने इसे “लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन” बताया।
बांग्लादेश इस वक्त दो खेमों में बंटा हुआ नज़र आ रहा है — एक वह जो शेख हसीना को देश की निर्माता मानता है, और दूसरा जो उन्हें तानाशाही शासन का प्रतीक कहता है। हसीना के दस साल के शासन में जहाँ देश की आर्थिक वृद्धि दर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची, वहीं आलोचकों का कहना है कि उन्होंने लोकतंत्र को कमजोर किया और विपक्ष को कुचल दिया। यही वजह है कि आज उनके खिलाफ जारी मुकदमा सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संघर्ष बन गया है — सत्ता, न्याय और जनमत के बीच।
ढाका की गलियों में फिलहाल सन्नाटा है, लेकिन यह सन्नाटा आने वाले समय के तूफ़ान का संकेत भी हो सकता है। अदालत का फैसला चाहे जो भी हो, बांग्लादेश अब एक नए मोड़ पर खड़ा है — जहाँ यह तय होगा कि लोकतंत्र मजबूत होगा या राजनीति फिर से हिंसा की ओर मुड़ जाएगी।