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सैकड़ों साल पुरानी मस्जिदों को ख़तरा?

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सैकड़ों साल पुरानी मस्जिदों को ख़तरा?

 

इंडिया Live: देश भर में वक़्फ़ संपत्तियों का मामला फिर सुर्ख़ियों में है, क्योंकि नई वक़्फ़ क़ानून व्यवस्था और UMEED नाम के डिजिटल पोर्टल पर अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। सरकार ने जून 2025 में यह पोर्टल शुरू किया था और सभी राज्यों को आदेश दिया था कि मस्जिदों, कब्रिस्तानों, मदरसों, ईदगाहों और वक़्फ़ की तमाम ज़मीनों का पूरा डेटा ऑनलाइन डालना ज़रूरी है, ताकि देश की सभी धार्मिक और चैरिटी संपत्तियों का पारदर्शी और सुरक्षित रिकॉर्ड तैयार हो सके। लेकिन बड़ी समस्या यह है कि देश की लगभग 70% वक़्फ़ संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। कई जगहों पर वक़्फ़ बोर्डों ने बताया कि उनके पास सैकड़ों साल पुरानी मस्जिदों और मकबरों के दस्तावेज़ ही मौजूद नहीं हैं, क्योंकि ये संपत्तियाँ तब बनाई गईं जब औपचारिक कागज़ात की व्यवस्था ही नहीं होती थी। कहीं सिर्फ़ मौखिक वक़्फ़नामा था, तो कहीं सदियों पुराने हस्तलिखित कागज़ धुंधले या नष्ट हो चुके हैं।

इसके अलावा कई राज्यों ने शिकायत की कि UMEED पोर्टल तकनीकी दिक्कतों से जूझता रहा—सर्वर क्रैश, डेटा अपलोड न होना, एक ही संपत्ति की लोकेशन बार-बार रिजेक्ट होना जैसी समस्याओं ने प्रक्रिया को और धीमा कर दिया। वहीं लाखों संपत्तियों का सर्वे, फोटो, नक्शा और रिकॉर्ड तैयार करना वक़्फ़ बोर्डों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ, क्योंकि जनशक्ति भी कम थी और समय भी सीमित।
सुप्रीम कोर्ट में कई राज्यों और बोर्डों ने समय सीमा बढ़ाने की मांग की, पर कोर्ट ने साफ़ कह दिया कि यह राष्ट्रीय स्तर की प्रक्रिया है, इसलिए सामूहिक रूप से डेडलाइन बढ़ाना संभव नहीं है। कोर्ट ने इतना ज़रूर कहा कि जिन संपत्तियों का रिकॉर्ड सच में उपलब्ध नहीं है, उन पर संबंधित वक़्फ़ ट्रिब्यूनल में व्यक्तिगत रूप से राहत मांगी जा सकती है, मगर यह रास्ता काफ़ी जटिल और समय-साध्य है। इन्हीं कारणों से अब डर यह है कि जिन मस्जिदों और वक़्फ़ संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन पूरा नहीं हो पाया, उन्हें “अनडॉक्यूमेंटेड” मानकर भविष्य में विवाद, कब्ज़ा, भूमि अधिग्रहण या ownership के सवाल खड़े हो सकते हैं।

वक़्फ़ बोर्डों और मुस्लिम संगठनों का कहना है कि जब कोई मस्जिद 300–400 साल पुरानी हो, उसका कोई ज़मीन का रजिस्ट्रेशन न हो और वह समाज की इबादतगाह रही हो, तो अचानक से उसी को क़ानूनी दस्तावेज़ के बिना असुरक्षित मानना ठीक नहीं। सरकार का तर्क है कि डिजिटल रजिस्टर बनने से फर्जी दावों, अवैध कब्जों और संपत्तियों की बिक्री पर रोक लगेगी। वहीं बोर्डों का कहना है कि उन्हें ज़्यादा वक़्त, ज़्यादा स्टाफ और लचीली व्यवस्था दी जानी चाहिए थी, ताकि इतनी विशाल और पुरानी धार्मिक संपत्तियों का डेटा ठीक ढंग से तैयार हो सके।

इन सबके बीच असली चिंता उन ऐतिहासिक मस्जिदों और कब्रिस्तानों को लेकर है जो गांव-कस्बों में सदियों से खड़े हैं और जिनके पास न तो कोई आधुनिक दस्तावेज़ है, न ही डिजिटल रिकॉर्ड। अगर वे रजिस्टर नहीं हुए, तो आने वाले समय में कानूनी विवाद, अतिक्रमण या प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए यह मुद्दा सिर्फ़ तकनीकी नहीं, बल्कि धार्मिक धरोहरों की सुरक्षा और समाज की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा संवेदनशील मामला बन गया है, जिस पर देशभर में बहस जारी है।

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