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रमजान में मस्जिदों से सेहरी-इफ्तार का ऐलान बंद

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Uttar Pradesh:  सरकार के लाउडस्पीकर संबंधी बयान के बीच मुस्लिम समुदाय की भावनाओं और धार्मिक परंपराओं को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। रमजान इस्लाम धर्म का पवित्र महीना है, जिसमें ‘सेहरी’ और ‘इफ्तार’ का समय बेहद अहम होता है। वर्षों से मस्जिदों से इन समयों की घोषणा की परंपरा चली आ रही है, जिसे समुदाय आपसी जुड़ाव और धार्मिक अनुशासन का हिस्सा मानता है। कई मुस्लिम संगठनों का कहना है कि यह केवल समय बताने का माध्यम नहीं, बल्कि इबादत और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर Supreme Court of India के स्पष्ट निर्देश पहले से लागू हैं और उनका पालन अनिवार्य है। सर्वोच्च न्यायालय ने ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए लाउडस्पीकर बजाने के समय और ध्वनि सीमा को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनका पालन सभी धार्मिक स्थलों को करना होता है। सरकार ने कहा कि कानून सभी के लिए समान है और किसी भी स्थिति में न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जाएगा।

Uttar Pradesh में रमजान के दौरान मस्जिदों से ‘सेहरी’ और ‘इफ्तार’ के ऐलान को लेकर उठे मुद्दे पर जहां सरकार ने अदालत के आदेशों के पालन की बात कही है, वहीं मुस्लिम समुदाय ने भी अपनी बात मजबूती से सामने रखी है। समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह परंपरा केवल समय बताने का साधन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जो रमजान के पाक महीने में खास महत्व रखती है।


रमजान इस्लाम धर्म का सबसे पवित्र महीना माना जाता है। इस दौरान रोजेदार सूर्योदय से पहले ‘सेहरी’ करते हैं और सूर्यास्त के बाद ‘इफ्तार’ के साथ रोजा खोलते हैं। इन दोनों समयों की सटीक जानकारी बेहद जरूरी होती है। मुस्लिम समाज का कहना है कि मस्जिदों से होने वाला ऐलान लोगों को समय की याद दिलाने के साथ-साथ आध्यात्मिक वातावरण भी तैयार करता है। जब लाउडस्पीकर से सेहरी या इफ्तार का ऐलान होता है, तो वह सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि इबादत की पुकार जैसा होता है, जो लोगों को एक साथ जोड़ता है।
समुदाय के कई धर्मगुरुओं और सामाजिक संगठनों का कहना है कि आज भले ही मोबाइल फोन और घड़ियों का दौर हो, लेकिन हर व्यक्ति तकनीकी साधनों पर निर्भर नहीं होता। ग्रामीण इलाकों, बुजुर्गों और जरूरतमंद लोगों के लिए मस्जिद से होने वाली घोषणा आज भी सहूलियत का माध्यम है। उनका तर्क है कि यह परंपरा समाज में अनुशासन, समयबद्धता और एकता की भावना को मजबूत करती है।
मुस्लिम पक्ष ने यह भी स्पष्ट किया है कि Supreme Court of India के दिशा-निर्देशों का सम्मान सभी के लिए अनिवार्य है और वे कानून के दायरे में रहकर ही धार्मिक गतिविधियां संचालित करना चाहते हैं। उनका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए समय सीमा और ध्वनि स्तर तय किए हैं, जिनका पालन किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। समुदाय का मानना है कि नियमों के भीतर रहकर लाउडस्पीकर का सीमित उपयोग धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत आता है।


समुदाय के प्रतिनिधियों ने संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का भी उल्लेख किया है। उनका कहना है कि भारत विविधताओं वाला देश है, जहां अलग-अलग धर्मों और परंपराओं का सम्मान किया जाता है। ऐसे में यदि कोई परंपरा वर्षों से शांति और अनुशासन के साथ निभाई जा रही है और वह कानूनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करती, तो उसे बनाए रखने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस मुद्दे को टकराव की बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए। रमजान का महीना संयम, सहिष्णुता और भाईचारे का संदेश देता है। ऐसे में जरूरी है कि प्रशासन और समुदाय के बीच बेहतर संवाद स्थापित हो, ताकि कानून का पालन भी हो और धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी बना रहे।
स्थानीय स्तर पर मुस्लिम समाज के लोगों ने भरोसा जताया है कि वे प्रशासन के साथ सहयोग करेंगे और किसी भी तरह की असुविधा या विवाद की स्थिति से बचने का प्रयास करेंगे। उनका कहना है कि उनका उद्देश्य केवल अपनी धार्मिक परंपराओं को शांतिपूर्ण और मर्यादित तरीके से निभाना है, न कि किसी को असुविधा पहुंचाना।


इस पूरे मामले में मुस्लिम समुदाय का रुख साफ है—वे कानून का सम्मान करते हुए अपनी आस्था और परंपराओं को जारी रखना चाहते हैं। उनका मानना है कि आपसी समझ, संतुलन और संवैधानिक मूल्यों के साथ ही इस विषय का समाधान संभव है। रमजान जैसे पवित्र महीने में सौहार्द और भाईचारे का माहौल बना रहे, यही सभी की प्राथमिकता होनी चाहिए

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