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नीतीश कुमार किसके साथ ज्यादा सहज? भाजपा या लालू 

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इंडिया लाइव :नीतीश कुमार की भाजपा से कथित नाराजगी की सच्चाई अभी तक सामने नहीं आई है. नीतीश कुमार कहते तो हैं कि वे एनडीए में ही रहेंगे, पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा. भरोसा न होने की वजह भी है. पहले भी वे जिस भाजपा के साथ मरते दम तक न जाने की बात कहते रहे, पर अब भाजपा का साथ न छोड़ने की बात कह रहे हैं. पहले की तरह ही उनका इस बार भी कहने का अंदाज है. इसलिए उनकी बातों पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा. सवाल उठता है कि नाराजगी है तो भाजपा के साथ वे क्यों बने रहने की बात बार-बार कह रहे हैं.

नीतीश को पहली बार सीएम बनने में भाजपा ने ही उनका साथ दिया तो आज भी उनके साथ खड़ी है. नीतीश यह भी जानते हैं कि भाजपा जो कहती है, उस पर कायम रहती है. वर्ष 2020 में चुनाव से पहले भाजपा ने कहा था कि एनडीए को कामयाबी मिली तो नीतीश कुमार ही सीएम बनेंगे. भाजपा ने ऐसा किया भी. जेडीयू जब 43 विधायकों वाली पार्टी बन गया, तब भी अपने 74 विधायक होने के बावजूद भाजपा ने उन्हें सीएम बनाया
उन्हें सीएम की कुर्सी तेजस्वी यादव को सौंपने के लिए जिस तरह मजबूर किया जाने लगा, उसका भी उन्हें एहसास है. दबाव का ही असर था कि नीतीश को नालंदा में यह घोषणा करनी पड़ी कि 2025 का चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में होगा. लालू यादव अपने बेटे की ताजपोशी के लिए इतना लंबा इंतजार नहीं करना चाहते थे. इसलिए नीतीश को किनारे लगाने के लिए उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में भेजने का ताना-बाना लालू ने बुना.
आरजेडी के नेता पहले से ही नीतीश के सीएम पद छोड़ने और तेजस्वी की ताजपोशी की तारीखें बताते रहे थे. जब लोकसभा चुनाव के लिए नीतीश ने टिकट बंटवारे पर जोर देना शुरू किया तो लालू आनाकानी करने लगे. लालू कहने लगे कि चुनाव में अभी समय है, इसलिए टिकट बंटवारे की हड़बड़ी क्यों. दरअसल लालू जेडीयू को सम्मानजनक सीटें देने के मूड में नहीं थे. नीतीश भी ठहरे राजनीति के माहिर खिलाड़ी. उन्होंने आरजेडी की मंशा भांप ली और साथ छोड़ने में ही भलाई समझी.

अब सवाल उठता है कि जब एनडीए में नीतीश इतने आराम से हैं तो उनकी नाराजगी की खबरें क्यों आ रही हैं. इसके दो ही तात्कालिक कारण दिखते हैं. पहला यह कि महाराष्ट्र में अपने सहयोगी एकनाथ शिंदे को भाजपा ने दूसरी बार सीएम नहीं बनाया. हालांकि यह कोई उचित कारण नहीं है. भाजपा ने शिंदे की शिवसेना से अधिक उम्मीदवार उनकी सहमति से उतारे थे. इतना ही नहीं, भाजपा के कई नेता शिवसेना के टिकट पर चुनाव भी लड़े. भाजपा ने शिवसेना से अधिक सीटें जीतीं. इसलिए अपना सीएम बनाने का भाजपा को नैतिक हक था. बिहार में वैसे भी जेडीयू भाजपा से अधिक या बराबर सीटों पर लड़ता रहा है. ऐसे में ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी को अपना सीएम बनाने का मौका मिलता है तो इसमें बुराई ही क्या है.
अमित शाह दो दिन के बिहार दौरे पर 5 जनवरी को आने वाले हैं. पटना में उनके दो कार्यक्रम हैं. भूतपूर्व भाजपा सांसद सुशील कुमार मोदी की जयंती पर होने वाले कार्यक्रम में वे शामिल होंगे. फिर गुरुद्वारा साहिब जाएंगे. पार्टी नेताओं के साथ बैठक भी करेंगे. संभव है कि वे नीतीश कुमार से भी मिलें. दोनों की मुलाकात हो गई तो संशय के बादल स्वत: छंट जाएंगे. यह भी हो सकता है कि अपने कार्यक्रम के दौरान अमित शाह मीडिया से भी कहीं न कहीं मुखातिब हो जाएं या फिर कार्यक्रम में ही कुछ ऐसा बोल जाएं, जिससे रहस्य से पर्दा हट जाए. हालांकि उन्होंने जो कुछ भी कहा है, उसमें उन्हें सफाई देने की जरूरत नहीं. बहरहाल, अगले 48 घंटे में स्पष्ट हो जाएगा कि नीतीश कुमार सच में नाराज हैं या नाराजगी की खबरें महज मीडिया की उपज हैं

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