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जातिगत जनगणना से सैय्यद और पठान की भी बढ़ेगी टेंशन।

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जातिगत जनगणना से सैय्यद और पठान की भी बढ़ेगी टेंशन।

नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्तर पर मोदी सरकार ने जातिगत जनगणना कराने का फैसला किया है तो उसका सियासी इफेक्ट सिर्फ हिंदू अपर कॉस्ट के ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार और कॉयस्थ पर ही नहीं पड़ेगा बल्कि मुस्लिमों के शेख, सैय्यद, पठान जैसी सवर्ण जातियों पर भी पड़ेगा. इसकी बड़ी वजह है कि जातिगत जनगणना होने के बाद आरक्षण का स्वरूप बदल सकता है.

पहली बार देश में जातिगत जनगणना होने जा रही है. मोदी सरकार ने कैबिनेट से जातिगत जनगणना का मंजूरी भी दे दी है. इस तरह हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय की जातियों की गणना की जाएगी. जनगणना की प्रश्वनावली में धर्म के साथ-साथ जाति का भी कॉलम होगा. बिहार और तेलंगाना में जाति सर्वे में हिंदुओं के साथ मुस्लिमों की जातियों के आंकड़े जुटाए गए थे. ऐसे में राष्ट्रीय स्तर जातिगत जनगणना होने जा रही है तो हिंदू और मुस्लिम दोनों की जातियों की गिनती की जाएगीमुस्लिम समुदाय की जातियां 3 प्रमुख वर्गों और सैकड़ों बिरादरियों में विभाजित हैं. उच्चवर्गीय मुसलमान को अशराफ कहा जाता है, जिसमें सैय्यद, शेख, तुर्क, मुगल, पठान, रांगड़, कायस्थ मुस्लिम, मुस्लिम राजपूत, त्यागी मुस्लिम आते हैं. मुसलमानों के पिछड़े वर्ग को पसमांदा मुस्लिम कहा जाता है. इसमें अंसारी, कुरैशी, मंसूरी, सलमानी, गुर्जर, गद्दी, घोसी, दर्जी, मनिहार, कुंजड़ा, तेली, सैफी, जैसी ओबीसी जातियां शामिल हैं. इसके बाद अतिपिछड़ी मुस्लिम हैं, जिनको अजलाल कहा जाता है, जिसमें धोबी, मेहतर, अब्बासी, भटियारा, नट, हलालखोर, मेहतर,भंगी, बक्खो, मोची, भाट, डफाली, पमरिया, नालबंद और मछुआरा शामिल हैं. मुस्लिमों में दलित जातियां नहीं होती है. देश में होने वाली जातिगत जनगणना में सिर्फ जातियों की संख्या सामने नहीं आएगी बल्कि उनकी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति का भी पता चलेगा. इससे ये भी पता चलेगा कि मुस्लिम समुदाय कितनी जातियों में बंटा हुआ है, कितनी संख्या अपर क्लास मुस्लिम की है और कितनी आबादी पसमांदा मुसलमानों की है. पीएम मोदी का फोकस पसमांदा मुसलमानों के लुभाने पर रहा, जो ओबीसी के तहत आते हैं. इस तरह से ओबीसी मुस्लिमों का प्रमाणिक आंकड़ा लोगों के सामने आएगा.

हालांकि, माना जाता है कि पसमांदा मुस्लिमों की आबादी 80 से 85 फीसदी है. ऐसे में जातिगत जनगणना से यह पता चल सकेगा कि कैसे पूरा मुस्लिम समाज पिछड़ा नहीं है बल्कि मुस्लिमों में पसमांदा वर्ग है जो पूरे मुस्लिमों मंा 80-85 फीसदी है पर उनका विकास या उत्थान नहीं हो सका है. यह मोटे तौर पर 1881 की जनगणना से मेल खाता है, जिसमें कहा गया था कि भारत में केवल 19 फीसदी मुसलमान उच्च जाति के थे, जबकि 81 फीसदी निचली जातियों से हैं.

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