
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय और अज़ीम प्रेम फाउंडेशन के सहयोग से हिमाचल के बिलासपुर में बायोफर्टिलाइज़र उत्पादन इकाई की स्थापना, जैविक खेती को मिलेगा नया आयाम
बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय और अज़ीम प्रेम फाउंडेशन के सहयोग से हिमाचल के बिलासपुर में बायोफर्टिलाइज़र उत्पादन इकाई की स्थापना, जैविक खेती को मिलेगा नया आयाम
लखनऊ/बिलासपुर: बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू), लखनऊ के तकनीकी सहयोग और अज़ीम प्रेम फाउंडेशन के वित्तीय सहयोग से हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले में एक अत्याधुनिक बायोफर्टिलाइज़र उत्पादन इकाई एवं प्रयोगशाला की स्थापना की गई है। इस पहल से उत्तर भारत के किसानों को जैविक खेती की दिशा में नया विकल्प और सशक्त मार्गदर्शन मिलेगा।बीबीएयू के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर नवीन कुमार अरोड़ा ने हाल ही में बिलासपुर का दौरा कर मानव विकास संस्थान के कर्मचारियों को सूक्ष्मजीव आधारित उर्वरकों (माइक्रोब-बेस्ड बायोफर्टिलाइज़र) के निर्माण और उपयोग संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किया। अब तक ये बायोफर्टिलाइज़र बीबीएयू में विकसित किए जाते थे और DST-SEED, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित परियोजना के अंतर्गत उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण किसानों को उपलब्ध कराए जाते थे। अब इस नई इकाई के माध्यम से स्थानीय स्तर पर उत्पादन शुरू हो गया है, जिससे किसान सीधे लाभान्वित होंगे।Trichoderma, Pseudomonas और Bacillus जैसे प्रमुख सूक्ष्मजीवों पर आधारित बायोफर्टिलाइज़र अब बिलासपुर में तैयार किए जाएंगे। ये सूक्ष्मजीव न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक हैं, बल्कि फसलों को रोगों से भी बचाते हैं। इन उत्पादों को ‘किसान का मित्र’ कहा जा रहा है क्योंकि ये रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम कर पर्यावरण संरक्षण में भी भूमिका निभाते हैं।प्रयोगशाला का उद्घाटन बिलासपुर के विधायक जीत राम कटवाल ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा, “यह प्रयोगशाला केवल किसानों के लिए नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगी। बीबीएयू और मानव विकास संस्थान का यह प्रयास राज्य में प्राकृतिक खेती को नई दिशा देगा।”प्रो. अरोड़ा ने स्थानीय किसानों के साथ संवाद करते हुए उन्हें जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया। मानव विकास संस्थान के निदेशक रसम सिंह चंदेल ने प्रो. अरोड़ा और उनकी टीम को धन्यवाद देते हुए कहा कि यह पहल क्षेत्र के कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के लिए वरदान साबित होगी और जैविक खेती को ‘मिशन मोड’ में आगे ले जाएगी।बीबीएयू की डॉ. प्रियंका वर्मा ने भी कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने और ग्रामीणों को जागरूक करने में अहम भूमिका निभाई।गौरतलब है कि प्रो. अरोड़ा की प्रयोगशाला बीते कई वर्षों से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल के दूरदराज़ इलाकों में सीमांत किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए कार्य कर रही है। उनकी पहल से कानपुर क्षेत्र की लगभग 100 एकड़ बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि में बदल दिया गया है। उनका मिशन रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभाव को कम करना और किसानों को टिकाऊ जैविक विकल्प प्रदान करना है।यह संयुक्त पहल न केवल जैविक खेती को बढ़ावा देगी, बल्कि स्थानीय रोजगार, पर्यावरण संरक्षण और खाद्य सुरक्षा जैसे लक्ष्यों को भी मजबूत करेगी।
