
The purpose of the martyrdom of Imam Hasan (AS) and Hussain (AS)इमाम हसन, हुसैन की शहादत का मकसद
शीर्षक: “कर्बला का सफ़र – सच्चाई के लिए क़ुर्बानी”
इमाम हसन(A.S) हुसैन (A.S) शहादत का मकसद
बहुत पुरानी बात है… हिजरी 61 का साल था। दोपहर का वक़्त था, लेकिन कर्बला की ज़मीन पर अंधेरा सा छा गया था। धूल, ग़म और ख़ून का मंज़र था। फरात नदी के किनारे एक बहुत बड़ा लश्कर खड़ा था — और उसके सामने एक छोटी सी फ़ौज थी, जो हक़ (सच्चाई) के लिए डटी हुई थी।
यह कहानी है हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि०) की — पैग़म्बर मोहम्मद (स०अ०व०) के नवासे की — और उनके वफ़ादार साथियों की, जिन्होंने ज़ुल्म के सामने कभी सर नहीं झुकाया।

हज़रत हसन (रज़ि०), इमाम हुसैन के बड़े भाई, पहले ही मुसलमानों के बीच झगड़े को ख़त्म करने के लिए अपनी ख़िलाफ़त छोड़ चुके थे। अमन (शांति) का पैग़ाम दिया था, जिसे सभी ने सराहा। लेकिन उन्हें ज़हर देकर शहीद किया गया — और ये ज़हर उनके ही रिश्तेदारों ने दिया। उस वक़्त भी हुसैन ने सब्र की मिसाल पेश की।

लेकिन असली इम्तिहान मोहर्रम के महीने में आया।
यज़ीद — एक ज़ालिम हुक़्मरान — चाहता था कि इमाम हुसैन उसकी बैअत (वफ़ादारी) करें, यानी उसे अपना हाकिम माने। लेकिन हुसैन ने साफ़ मना कर दिया:
“एक ज़ालिम को मैं कभी नहीं मान सकता। मैं नबी के दीन का सच्चा रहनुमा हूँ, और मैं हक़ से पीछे नहीं हटूंगा।”
यज़ीद ने फौज भेजी, और हुसैन (रज़ि०) ने मदीना छोड़कर मक्का की ओर रुख किया। वहां से कर्बला का सफ़र शुरू हुआ। उनके साथ थे उनके परिवार के लोग और कुछ वफ़ादार साथी — कुल मिलाकर 72 लोग।
कर्बला की ज़मीन पर इन सबका पानी बंद कर दिया गया। छोटे-छोटे बच्चों को भी प्यासा रखा गया। फरात नदी सामने थी, लेकिन पानी तक जाने का रास्ता बंद था।
10 मोहर्रम — यानी आशूरा का दिन — आ गया।
रात भर इमाम हुसैन (रज़ि०) ने इबादत की। अपने साथियों से कहा:
“जो जाना चाहे, उसे इजाज़त है। दुश्मन सिर्फ़ मुझे चाहते हैं।”
लेकिन कोई नहीं गया। सबने कहा:
“हुसैन, हम आपके साथ हैं। मर जाएंगे लेकिन आपका साथ नहीं छोड़ेंगे।”
पहले उनके भाई हज़रत अब्बास शहीद हुए — जिन्होंने फरात से पानी लाने की कोशिश की थी, लेकिन उनके हाथ काट दिए गए।
फिर उनके जवान बेटे अली अकबर, और छोटे मासूम बेटे अली असगर शहीद हुए। इमाम हुसैन ने जब अपने छह महीने के बेटे को गोद में उठाया, तो दुश्मन ने उसके गले में तीर मार दिया।
आख़िर में, इमाम हुसैन खुद मैदान में उतरे।
ज़ख़्मी हुए, लेकिन गिरते हुए भी कुरआन की तिलावत करते रहे। दुश्मन ने उनका सिर तन से जुदा कर दिया। उनका जिस्म तपती ज़मीन पर प्यास और दर्द में छोड़ दिया गया।
मोहर्रम का मतलब क्या है?
मोहर्रम एक ग़म का महीना है — यह याद दिलाता है कि सच्चाई के लिए क़ुर्बानी देनी पड़ती है। इमाम हुसैन ने दिखाया कि हक़ के रास्ते पर चलना आसान नहीं होता — लेकिन वही रास्ता सबसे बेहतरीन है।
इमाम हुसैन की शहादत सिर्फ एक इंसान की मौत नहीं थी — वो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ एक ऐसी आवाज़ थी जो क़यामत तक गूंजती रहेगी:
“सर कटवा सकता हूँ, लेकिन झुक नहीं सकता।”
आज भी मोहर्रम में लोग मातम करते हैं, रोते हैं — लेकिन ये ग़म सिर्फ आंसुओं का नहीं है, यह एक पैग़ाम है:
“जब भी ज़ुल्म हो, तो हुसैनी बन जाओ — सच्चाई के लिए खड़े हो जाओ।”
यही है कर्बला का असर। यही है उसकी कहानी।
