diwali horizontal

बिहार चुनाव में 5 करोड़ लोग नहीं दे पाएंगे वोट।

0 70

बिहार चुनाव में 5 करोड़ लोग नहीं दे पाएंगे वोट।

Bihar Election:बिहार में इन दिनों एक बड़ा चुनावी विवाद सामने आया है, जिससे पूरे राज्य की राजनीति गरमा गई है। मामला चुनाव आयोग की एक नई प्रक्रिया से जुड़ा है,

 

जिसे “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” यानी विशेष पुनरीक्षण कहा जा रहा है। इस प्रक्रिया के तहत 2003 के बाद जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट में जुड़े हैं, उनसे फिर से पहचान के दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। आयोग का कहना है कि इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि वोटर भारतीय नागरिक हैं और फर्जी नाम लिस्ट में ना रहें। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इसके ज़रिए सरकार लगभग दो करोड़ लोगों को वोट देने से वंचित करना चाहती है।

तेजस्वी यादव, राहुल गांधी और पूरे महागठबंधन ने इस मुद्दे को बहुत गंभीरता से उठाया है। उनका कहना है कि यह एक सोची-समझी साजिश है,

जिससे गरीब, दलित, महिलाएं और प्रवासी मजदूरों को वोट देने से रोका जाएगा। ये वे लोग हैं जो आमतौर पर सरकार के खिलाफ वोट करते हैं और कागज़ों की कमी के कारण इस प्रक्रिया में फंस सकते हैं। तेजस्वी यादव का आरोप है कि केंद्र सरकार और चुनाव आयोग मिलकर लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर सीधा प्रधानमंत्री और नीतीश कुमार को घेरा है और इसे गरीबों के साथ अन्याय बताया है।

9 जुलाई को बिहार में महागठबंधन ने राज्यव्यापी बंद बुलाया। इस दौरान पटना सहित कई जगहों पर टायर जलाए गए, सड़कें जाम की गईं और भारी विरोध प्रदर्शन हुआ। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव खुद सड़कों पर उतरे और लोगों से अपील की कि वे अपने वोट के अधिकार को बचाने के लिए आवाज़ उठाएं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को डर है कि जनता अब बदलाव चाहती है, इसलिए वह वोटर लिस्ट से नाम हटाकर चुनाव को एकतरफा बनाना चाहती है।

वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि यह एक सामान्य और कानूनी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य केवल वोटर लिस्ट को साफ और सही रखना है। आयोग के मुताबिक अगर कोई भारतीय नागरिक है और दस्तावेज़ देगा तो उसका नाम लिस्ट में बना रहेगा। लेकिन सवाल उठता है कि क्या सच में सभी लोगों के पास जरूरी दस्तावेज़ हैं? क्या गांवों, बाढ़ग्रस्त इलाकों और मजदूर तबके के पास इतने संसाधन हैं कि वे समय पर अपने कागज़ दिखा सकें?

विपक्ष की दलील है कि जब राज्य में मानसून और बाढ़ का समय है, लोग खेती-किसानी और मजदूरी में लगे हैं, तब इतनी जल्दी में दस्तावेज़ इकट्ठा करना संभव नहीं है। उनका यह भी कहना है कि अगर यह प्रक्रिया अब जारी रही, तो करोड़ों लोगों के नाम लिस्ट से कट सकते हैं और वे वोट नहीं दे पाएंगे। इससे न सिर्फ उनका लोकतांत्रिक अधिकार छिनेगा, बल्कि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने में भी परेशानी हो सकती है।

इस मुद्दे को लेकर विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है और 10 जुलाई को इस पर सुनवाई होनी है। कोर्ट में यह तय होगा कि चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया सही है या फिर इसे रोका जाना चाहिए। विपक्ष को उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दखल देगा और प्रक्रिया को या तो टालेगा या फिर इसे सरल बनाएगा ताकि किसी का हक न छिने।

बिहार की राजनीति में यह मुद्दा अब चुनाव से पहले का सबसे बड़ा राजनीतिक और सामाजिक सवाल बन चुका है। क्या वाकई दो करोड़ लोग वोट देने से वंचित हो जाएंगे? क्या यह चुनावी चाल है या एक कानूनी और सही प्रक्रिया? क्या सुप्रीम कोर्ट इस पर रोक लगाएगा? इन सारे सवालों के जवाब आने वाले कुछ दिनों में मिलेंगे। फिलहाल जनता असमंजस में है और विपक्ष इसे जनता के हक और संविधान की रक्षा की लड़ाई बता रहा है।

इस पूरे मामले का छोटा और साफ निष्कर्ष यह है कि बिहार में वोटर लिस्ट की जांच ने बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। चुनाव आयोग इसे जरूरी प्रक्रिया कह रहा है, लेकिन विपक्ष का दावा है कि इससे करोड़ों गरीब और कमजोर लोग वोट नहीं दे पाएंगे। सुप्रीम कोर्ट अब इस पर फैसला करेगा। ज़रूरी है कि वोट देने का हक सबको बराबरी से मिले, बिना किसी डर या भेदभाव के।

Leave A Reply

Your email address will not be published.