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जंगी माहौल और अरबाईन।

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जंगी माहौल और अरबाईन।

अरबाईन: अरब जगत इस वक़्त सुलग रहा है। ग़ज़ा से लेकर यमन, लेबनान से लेकर सीरिया तक, हर तरफ़ ख़ून-ख़राबा, बेबसी और तबाही का आलम है। ऐसे में एक सवाल लाखों दिलों को बेचैन कर रहा है — इस साल का अरबाइन कैसे मना जाएगा? क्या हज़ारों मील दूर से पैदल चलकर कर्बला पहुंचने वाले अकीदतमंद इस बार भी उसी शिद्दत और अम्न के साथ वहाँ पहुँच सकेंगे, जिस तरह हर साल होते आए हैं?

अरबाइन कोई आम मज़हबी जलसा नहीं, ये एक एहसास है। ये उस ग़म की ताज़ादारी है जो हुसैन इब्ने अली और उनके चाहने वालों की कुर्बानियों की याद में हर साल इराक़ की सरज़मीन पर जमा होती है। करोड़ों ज़ायरीन, जिनमें न सिर्फ़ शिया मुसलमान होते हैं बल्कि सुन्नी, ईसाई, यहां तक कि हिन्दू और यहूदी भी शामिल होते हैं, कर्बला तक पैदल सफर करते हैं — ताकि वो उस पैग़ाम-ए-हुसैनी को सलाम करें जो ज़ुल्म के खिलाफ सर उठाकर खड़ा होना सिखाता है।

लेकिन इस बार फिज़ा कुछ और है। ईरान और इज़रायल के दरम्यान तनातनी अपने चरम पर है। ग़ज़ा में हर रोज़ दर्जनों जाने जा रही हैं, और इज़रायली बमबारी थमने का नाम नहीं ले रही। लेबनान में हिज़बुल्लाह और इज़रायल के बीच झड़पें बढ़ गई हैं, जिससे इलाकाई हालात और ज़्यादा नाज़ुक हो गए हैं।

इधर इराक़ में भी हालात पूरी तरह क़ाबू में नहीं हैं। बग़दाद और बसरा जैसे शहरों में आए दिन छोटे-मोटे धमाके या मिलिशिया के बीच टकराव की खबरें आती रहती हैं। ऐसी सूरत में अर्बईन जैसे विशाल इज्तिमा की हिफाज़त एक बड़ा सवाल बन गया है।

 

इराक़ी सरकार ने ऐलान किया है कि वो इस साल अरबाइन के लिए सिक्योरिटी के इंतिहाई सख़्त इंतेज़ामात कर रही है। स्पेशल फोर्स, इंटेलिजेंस एजेंसियां और लोकल पुलिस, सबको अलर्ट पर रखा गया है। एयरस्पेस पर भी नज़र रखी जा रही है और ज़ायरीन के रास्तों की लगातार निगरानी की जा रही है। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये तमाम इंतेज़ामात उस ख़ौफ़ को मिटा सकते हैं जो पूरे मिडिल ईस्ट पर छाया हुआ है?

कई देशों में ज़ायरीन को वीज़ा देने की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। कुछ देशों ने तो अपने नागरिकों को इराक़ ना जाने की सलाह तक दे डाली है। दूसरी तरफ़ बहुत से अकीदतमंद ऐसे भी हैं जो इन हालात के बावजूद जाने को बेताब हैं। उनका कहना है कि हुसैन की राह में डर कैसा? जो शख्स कर्बला में प्यासा शहीद हुआ, उसके नाम पर चलने वालों को कोई धमकी नहीं रोक सकती। सोशल मीडिया पर ऐसे हज़ारों वीडियोज़ वायरल हो रहे हैं, जिसमें लोग अपने सफर-ए-अरबाइन की तैयारियां करते हुए दिख रहे हैं — कोई किराये की गाड़ी में सामान लाद रहा है, कोई अपनी बच्ची को कर्बला की कहानी सुना रहा है, और कोई अपनी बूढ़ी मां के साथ सफर की तैयारी कर रहा है।

इस साल एक और बात जो अरबाइन को अलग बना रही है, वो है डिजिटल मुन्तज़मी यानी ऑनलाइन इंतेज़ामात। दुनिया के कई इलाक़ों में लोगों ने वर्चुअल ज़ियारत और लाइव कवरेज के ज़रिए अर्बईन का हिस्सा बनने की तैयारी की है। यू ट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर लाखों लोग लाइव रूट्स पर नज़र रखेंगे। ऑनलाइन सद्क़ा देना, ई-खिदमत और डिजिटल मशविरों के ज़रिए भी लोग इस मुहिम में शामिल होंगे।

हालांकि ज़मीन पर हालात वाक़ई पेचीदा हैं। शिया ज़ायरीन का बड़ा तबक़ा ईरान से आता है, और ईरान इस वक़्त इज़रायल से सीधे टकराव की कगार पर है। कोई भी बड़ा हमला या जवाबी कार्रवाई अर्बईन के रास्तों को सीधा निशाना बना सकती है। यही वजह है कि बहुत से लोग दुआ कर रहे हैं कि कम-अज़-कम इन दिनों में अम्न क़ायम रहे ताकि हुसैनी रूहानियत को कोई नुकसान न पहुंचे।

एक और चिंता इराक़ के अंदर मौजूद अलग-अलग मिलिशिया गुटों को लेकर भी है। बहुत बार ऐसा हुआ है कि ये गुट आपस में या सरकारी फोर्सेज़ के साथ टकरा गए हों। लेकिन अरबाइन के दौरान ये तमाम गुट एक दूसरे से तालमेल बनाते हैं और अपनी-अपनी खिदमतें अंजाम देते हैं। हर साल की तरह इस बार भी मोअक्किब (जो ज़ायरीन के लिए खाने-पीने और ठहरने का इंतेज़ाम करते हैं) अपनी जान की परवाह किए बगैर मैदान में हैं। उनका कहना है कि “हमारी रूह का सुकून इसी में है कि हुसैन के चाहने वालों की खिदमत कर सकें, चाहे कुछ भी हो जाए।”

लेकिन सियासी ताश के पत्तों पर टिके इस मिडिल ईस्ट में कुछ भी तय नहीं है। अमेरिका, ईरान, इज़रायल, सऊदी अरब और तुर्की जैसे बड़े खिलाड़ी हर दिन कोई नया बयान या क़दम उठा रहे हैं, जो हालात को और उलझा देता है। इन सब के बीच अगर अरबाइन का कारवां बेख़ौफ़ और बेदाग़ कर्बला पहुंच जाए, तो ये किसी मोजिज़े से कम नहीं होगा।

आख़िर में यही कहा जा सकता है कि अरबाइन सिर्फ़ एक मज़हबी रस्म नहीं, ये मज़लूमियत, सच्चाई और इंसाफ़ की तलाश में निकले क़दमों का नाम है। चाहे रास्ते में बम हों या बारूदी सुरंगें, हुसैन के चाहने वाले हर हाल में पहुंचते हैं। इस बार भी उम्मीद यही है कि अम्न की चादर कुछ दिनों के लिए ही सही, इस ज़मीन पर तनी रहे — ताकि इंसानियत एक बार फिर कर्बला की सरज़मीन पर सजदा कर सके।

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