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उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान में गुरु पूर्णिमा पर भव्य आयोजन, गुरु-शिष्य परंपरा और आधुनिक शिक्षा पर हुई विचार गोष्ठी

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उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान में गुरु पूर्णिमा पर भव्य आयोजन, गुरु-शिष्य परंपरा और आधुनिक शिक्षा पर हुई विचार गोष्ठी

लखनऊ: उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के परिसर में गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आज एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य विषय था—‘आधुनिक शिक्षापद्धति में गुरु-शिष्य परंपरा का अन्तर्सम्बंध’, जिस पर विद्वानों द्वारा गहन विचार-विमर्श किया गया। साथ ही प्रदेश भर से पधारे संस्कृत विद्यालयों व महाविद्यालयों के सेवानिवृत्त शिक्षकों और अन्य गुरुओं को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और माल्यार्पण के साथ हुआ, इसके उपरांत अतिथियों का वाचिक स्वागत किया गया। संस्थान के निदेशक विनय श्रीवास्तव ने अपने उद्बोधन में बताया कि उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा प्रारंभ से ही गुरु पूर्णिमा के अवसर पर संस्कृत शिक्षकों को सम्मानित करने की परंपरा रही है। उन्होंने कहा कि संस्थान ने इस आयोजन को और व्यापक रूप देते हुए अब उन गुरुओं को भी सम्मानित करना प्रारंभ किया है जो सेवानिवृत्त नहीं हैं लेकिन अपने संसाधनों से निःशुल्क संस्कृत शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। अब तक संस्थान द्वारा 1200 से अधिक गुरुओं का सम्मान किया जा चुका है।निदेशक श्रीवास्तव ने गुरु पूर्णिमा के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की जयंती का दिन भी है, जिन्हें आदि गुरु के रूप में जाना जाता है। वेदव्यास ने न केवल वेदों का संकलन किया बल्कि पुराणों और महाकाव्यों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को दिशा दी।कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथि प्रो. ओम प्रकाश पाण्डेय ने वेदव्यास के व्यक्तित्व और कृतित्व का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि उन्होंने वेद, पुराण और इतिहास को आम जन तक पहुंचाया और भारतीय लोक की चेतना को स्वर प्रदान किया। वहीं, प्रो. आज़ाद मिश्र ने गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन शिक्षा पद्धति आज भी सार्थक है—भले ही विषय और संसाधन आधुनिक हो गए हों, परंतु गुरु और शिष्य का संबंध आज भी वैसा ही गहन और पवित्र है।डॉ. रेखा शुक्ला ने भारतीय चिंतन परंपरा में शिक्षा के उद्देश्य पर बोलते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा पद्धति का मूल निःश्रेयस (परम कल्याण) है। गुरु वही है जो शिष्य के अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश देता है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए प्रो. उम्बानी त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान वंदनीय है, और अंधकार को मिटाने वाला गुरु स्वयं प्रकाश का प्रतीक होता है।गुरु पूर्णिमा के इस विशेष आयोजन ने एक बार फिर गुरु-शिष्य परंपरा की भारतीय शिक्षा प्रणाली में केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया और यह संदेश दिया कि आधुनिक युग में भी गुरुओं का मार्गदर्शन और उनकी निःस्वार्थ सेवा समाज के लिए प्रेरणा बनी हुई है। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित यह आयोजन न केवल एक सांस्कृतिक और शैक्षिक संगम था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी संस्कार, ज्ञान और सेवा की परंपरा से जोड़ने वाला प्रयास था।

   

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