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भविष्य में मुसलमानों का अगला पड़ाव क्या आज़ाद समाज पार्टी हो सकती है ?

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भविष्य में मुसलमानों का अगला पड़ाव क्या आज़ाद समाज पार्टी हो सकती है ?

सामाजिक, राजनीतिक, सांप्रदायिक उथल-पुथल के बीच मिली देश की आज़ादी के समय से ही मुसलमान त्रासदियों का सामना करता रहा है जिसकी परिणीति सामुदायिक- मानसिक-आघात है इस मनोदशा में मुसलमान की सियासी महत्वाकांक्षा “जान-माल, इज़्ज़त-आबरू की सुरक्षा” तक ही सीमित रही है लेकिन देश की सेकुलर पार्टियों का कर्मठ-मुसलमान- वोटर आज़ादी के 78 साल बाद भी वहीं खड़ा है ‘राजनीति की बिसात पर महज़ शतरंज का एक मोहरा’ , सेकुलर सियासी पार्टियां मुसलमानों के वोट पर अपना हक़ समझती हैं लेकिन जब यही मुसलमानों के वोट से सत्ता में आती है तो उन्हें कुछ देने के लिए तैयार नहीं होतीं

 

जुलाई मास के दूसरे सप्ताह में ‘आजाद समाज पार्टी’ का लखनऊ में ‘मुस्लिम सम्मेलन’ अटल बिहारी कन्वेंशन सेंटर में था इसी दिन फिर अचानक शाम को वी वी आई पी गेस्ट हाउस में ऑल इंडिया दलित मुस्लिम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सलाहुद्दीन शीबू एडवोकेट की चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ से मुलाक़ात से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में  नए दलित-मुस्लिम समीकरणों की सुगबुगाहट तेज़ हो गई जैसा की विदित है कि सलाहुद्दीन शीबू गत 20 वर्षों से संविधान के अनुच्छेद 341 में दलित मुसलमानो को शामिल कर ‘हक़-इंसाफ-आरक्षण’ की तहरीक चला रहे हैं और इस आवाज़ को उठाने वाले उत्तर प्रदेश के पहले मुस्लिम लीडर हैं उनके आग्रह पर वर्ष 2006 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने दलित मुसलमानो को अनुच्छेद 341 में शामिल कर ‘हक़-इंसाफ-आरक्षण’ दिलाने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश विधानसभा से पारित कराकर केंद्र को भेजा था तब से लगातार 2007 से अब तक जितने भी विधानसभा, लोकसभा के चुनाव होते रहे हैं उसमें सलाहुद्दीन शीबू ने न सिर्फ समाजवादी पार्टी को समर्थन दिया बल्कि पूरे प्रदेश में घूम-घूम कर बड़ी तादाद में दलित-मुसलमानो का वोट समाजवादी पार्टी के पक्ष में कराया सलाहुद्दीन शीबू सपा के अल्पसंख्यक इकाई के राष्ट्रीय सचिव भी रहे हैं लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव से अचानक सलाहुद्दीन शीबू का निष्क्रीय हो जाना और पार्टी के कार्यक्रमो में भाग न लेना है यह इंगित करता है कि धीरे-धीरे ज़मीन पर काम करने वाले मुस्लिम नेताओं का पार्टी से मोह भंग हो रहा है और उन्हें उचित स्थान और सम्मान पार्टी में नहीं मिल रहा है

 

पिछले कुछ वर्षों में मुसलमानों की बड़ी से बड़ी समस्या पर समाजवादी पार्टी का सिर्फ अख़बारी बयानों तक सीमित रहना भी कहीं न कहीं मुसलमानो में चिंता का विषय बना हुआ है पार्टी को शायद ऐसा लगता है कि कुछ तथाकथित दाढ़ी-टोपी वाले मुस्लिम रहनुमाओं को शो-पीस की तरह मंचों पर बैठाकर भविष्य में मुसलमानों का वोट हासिल किया जा सकता है तो समाजवादी पार्टी को इस भ्रम से बाहर निकलना चाहिए यदि ऑल इंडिया दलित-मुस्लिम मोर्चा भविष्य में ‘आजाद समाज पार्टी’ के साथ आता है तो सपा को एक बड़े दलित-मुस्लिम वोट बैंक से हाथ धोना पड़ सकता है

( लखनऊ में आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष एवं सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ , सलाउद्दीन शीबू से मुलाकात करते हुए )

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