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यूपी BJP में दरार या तकरार?

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यूपी BJP में दरार या तकरार ?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक सवाल बार-बार उठ रहा है—क्या सब कुछ सचमुच ठीक है या फिर सत्ता के गलियारों में कोई अंदरूनी खींचतान चल रही है? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के अलग-अलग सुरों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। हालिया विवादों और सार्वजनिक बयानों में जो टोन का अंतर दिखा, उसने यह धारणा बना दी कि सरकार के शीर्ष नेतृत्व में पूरी तरह सामंजस्य नहीं है। राजनीतिक गलियारों में इसे “2 डिप्टी सीएम बनाम योगी” की तरह पेश किया जा रहा है, हालांकि हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल और रणनीतिक हो सकती है।


सबसे पहले समझना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश देश की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां की सियासत सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करती है। ऐसे में भाजपा के लिए यूपी में नेतृत्व की छवि बेहद अहम है। योगी आदित्यनाथ पिछले कई वर्षों से एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित हुए हैं। कानून-व्यवस्था, बुलडोजर नीति, धार्मिक मुद्दों पर स्पष्ट रुख और प्रशासनिक सख्ती—इन सबने उनकी अलग पहचान बनाई है। पार्टी के समर्थक वर्ग में उनकी छवि एक कठोर और निर्णायक प्रशासक की है।
लेकिन भाजपा की राजनीति सिर्फ एक चेहरे पर आधारित नहीं है। पार्टी सामाजिक और जातीय संतुलन को ध्यान में रखकर नेतृत्व संरचना तैयार करती है। यही वजह है कि डिप्टी सीएम के तौर पर केशव प्रसाद मौर्य जैसे ओबीसी चेहरे को महत्व दिया गया। यह संतुलन भाजपा की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा है। जब भी डिप्टी सीएम का बयान मुख्यमंत्री से अलग लहजे में आता है, तो उसे केवल मतभेद के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक संदेश के रूप में भी देखा जाता है।
हालिया घटनाक्रम में जिस मुद्दे पर दोनों नेताओं के बयान अलग दिखे, उसने मीडिया को बड़ा नैरेटिव गढ़ने का मौका दिया। मुख्यमंत्री का रुख अपेक्षाकृत कड़ा था, जबकि डिप्टी सीएम ने संतुलित और संयमित भाषा का इस्तेमाल किया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह अंतर दो संभावनाएं दिखाता है—या तो पार्टी के भीतर दृष्टिकोणों की विविधता है, या फिर यह सुनियोजित रणनीति है जिससे अलग-अलग वर्गों को अलग-अलग संदेश दिया जा सके।


यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भाजपा जैसे बड़े संगठन में विभिन्न विचारधारात्मक और सामाजिक पृष्ठभूमि के नेता होते हैं। हर नेता का अपना समर्थक आधार होता है। योगी आदित्यनाथ का मजबूत हिंदुत्व चेहरा है, जबकि केशव प्रसाद मौर्य पिछड़े वर्ग की राजनीति में प्रभाव रखते हैं। ऐसे में अगर दोनों की प्राथमिकताएं या बयान शैली अलग हो, तो यह जरूरी नहीं कि वह टकराव ही हो। कई बार यह आंतरिक संतुलन बनाए रखने की प्रक्रिया होती है।


विपक्ष इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देख रहा है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दल इसे भाजपा की आंतरिक गुटबाजी बता रहे हैं। उनका तर्क है कि अगर सरकार के भीतर ही अलग-अलग आवाजें उठ रही हैं, तो इसका असर प्रशासनिक फैसलों पर भी पड़ सकता है। हालांकि अब तक ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि सरकार की नीतियों या निर्णयों में किसी प्रकार की रुकावट आई हो।
राजनीतिक इतिहास देखें तो उत्तर प्रदेश में नेतृत्व संघर्ष नई बात नहीं है। लेकिन मौजूदा परिस्थिति में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2027 का विधानसभा चुनाव है। पार्टी नहीं चाहेगी कि नेतृत्व को लेकर कोई भ्रम या अस्थिरता का संदेश जनता तक जाए। इसलिए सार्वजनिक मंचों पर एकजुटता दिखाना रणनीतिक रूप से जरूरी है। यही कारण है कि शीर्ष स्तर से लगातार एकता और सामंजस्य का संदेश दिया जा रहा है।
कुछ विश्लेषक यह भी मानते हैं कि भाजपा के भीतर नेतृत्व की कई परतें होना उसकी ताकत है, कमजोरी नहीं। अलग-अलग चेहरों के जरिए पार्टी विभिन्न सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाती है। यदि मुख्यमंत्री सख्त प्रशासक की छवि को मजबूत करते हैं, तो डिप्टी सीएम सामाजिक समीकरणों को साधने की भूमिका निभाते हैं। इस नजरिए से देखें तो अलग-अलग बयानबाज़ी एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकती है।

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