
साजिद रशीदी विवाद : इस्लाम में नसीहत है, किसी महिला का अपमान नहीं!
क्या मौलाना इस्लाम की तालीम भूल गए?”
इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो इंसानियत, अदब और दूसरों की इज़्ज़त करने की सीख देता है।
कुरआन और हदीस बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि किसी का मज़ाक उड़ाना, ताना मारना या सार्वजनिक रूप से किसी की बेइज़्ज़ती करना गुनाह है — चाहे वो औरत हो या मर्द। लेकिन हाल ही में एक टीवी डिबेट के दौरान जब मौलाना साजिद रशीदी ने समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव के पहनावे पर टिप्पणी की

और उन्हें शर्मिंदा करने की कोशिश की, तो ये सवाल उठने लगे कि क्या ऐसा बर्ताव इस्लाम की असल तालीम के मुताबिक है? विवाद बढ़ा, FIR दर्ज हुई, और देशभर में बहस छिड़ गई — क्या धर्म के नाम पर किसी की इज़्ज़त से खिलवाड़ किया जा सकता है?

हाल ही में एक टीवी डिबेट में मौलाना साजिद रशीदी ने समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव पर अभद्र टिप्पणी कर दी।

मामला तब उठा जब डिंपल यादव एक मस्जिद में गईं और उन्होंने सिर पर पल्लू नहीं रखा था। मौलाना ने इस पर कहा कि उन्होंने पर्दा नहीं किया और उनके पहनावे को लेकर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने तुलना की इक़रा हसन से, जिन्होंने सिर ढक रखा था, और कहा कि डिंपल को उनसे सीखना चाहिए थी।

इस टिप्पणी को लेकर देशभर में गुस्सा देखने को मिला। सोशल मीडिया पर इसे महिला विरोधी और अभद्र बताया गया। कई लोगों ने कहा कि किसी महिला के पहनावे को इस तरह से मंच पर बैठकर अपमानजनक अंदाज़ में उठाना न तो इंसानियत है, न ही इस्लामी तहज़ीब।
अगर इस पूरे मसले को इस्लाम की नज़र से देखें तो बात और साफ हो जाती है। इस्लाम सिखाता है कि किसी का भी तिरस्कार नहीं करना चाहिए। कुरआन और हदीस में साफ तौर पर कहा गया है कि दूसरों का अपमान करना, ताना मारना, मज़ाक उड़ाना, और बुराई फैलाना गुनाह है।
कुरआन की सूरह अल-हुजुरात (49:11) में कहा गया है:
“ऐ ईमान वालों! न कोई क़ौम दूसरी क़ौम का मज़ाक उड़ाए, हो सकता है वे उनसे बेहतर हों, और न औरतें दूसरी औरतों का मज़ाक उड़ाएँ, हो सकता है वे उनसे बेहतर हों।”
इस आयत से साफ है कि इस्लाम मज़ाक उड़ाने या किसी के पहनावे या तरीके पर तंज कसने की इजाज़त नहीं देता। बल्कि इंसान को दूसरों की इज़्ज़त करने का हुक्म दिया गया है।
इसी तरह पैग़म्बर मोहम्मद (स.अ.) की हदीस है:
“मुसलमान वो है जिसकी ज़बान और हाथ से दूसरे मुसलमान महफूज़ रहें।”
– (सहीह बुखारी)
यहां ‘मुसलमान’ शब्द आया है लेकिन इसका दायरा सभी इंसानों तक फैला हुआ है — मतलब किसी को तकलीफ देना, भरी सभा में शर्मिंदा करना इस्लाम में जायज़ नहीं।
अब सवाल उठता है कि अगर मौलाना को डिंपल यादव के पहनावे पर कोई धार्मिक आपत्ति थी, तो क्या उसे इस तरह टीवी पर सार्वजनिक रूप से कहने का तरीका सही था? जवाब सीधा है: इस्लाम में नसीहत दी जाती है, लानत नहीं। सुधार के लिए सलाह दी जाती है, अपमान नहीं। और वो भी अदब और सलीके से।
डिंपल यादव पर की गई टिप्पणी सिर्फ़ राजनीतिक नहीं थी, बल्कि इससे यह संदेश गया कि एक धर्म के नाम पर एक महिला की इज़्ज़त को मंच से गिराने की कोशिश की गई। जबकि इस्लाम खुद कहता है कि महिलाओं को इज़्ज़त दो, और अगर किसी से मतभेद हो भी, तो प्यार और समझदारी से बात करो, तौहीन से नहीं।
इस बयान के बाद डिंपल यादव ने भी प्रतिक्रिया दी और कहा कि ऐसी सोच गलत है, लेकिन FIR दर्ज हो जाना सही क़दम है। अखिलेश यादव भी बाद में बोले कि उनकी पत्नी वही कपड़े पहनती हैं जो वो संसद में पहनती हैं — क्या अब हर जगह की पोशाक तय करेंगे लोग?
इस मामले में बीजेपी और एनडीए के सांसदों ने भी विरोध किया, लेकिन सवाल तब उठता है जब कुछ राजनीतिक दल महिला अधिकारों की बात चुन-चुन कर करते हैं — जहाँ विरोध उन्हें राजनीतिक फ़ायदा दे।
इस विवाद से एक बात तो साफ है — धर्म कोई भी हो, उसका मक़सद इज़्ज़त सिखाना होता है, अपमान नहीं। जो भी धर्म के नाम पर किसी महिला को शर्मिंदा करता है, वो न तो इंसानियत निभा रहा है, न ही अपने मज़हब की असल तालीम।
अगर ये बात सब समझ लें — मौलाना हों या नेता — तो शायद समाज में ज़्यादा शांति और इज़्ज़त का माहौल बनेगा।