
तुर्की और इज़राइल की सीधी टक्कर!
MIDDLE EAST TENSION: मध्य-पूर्व की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। हालिया घटनाओं के बाद Israel और Turkey के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया है। सवाल उठ रहा है—क्या यह सिर्फ कूटनीतिक बयानबाज़ी है या क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदलने की शुरुआत? और क्या इज़राइल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu की रणनीति पर इसका असर पड़ रहा है?
ग़ज़ा में जारी संघर्ष के बीच तुर्की ने इज़राइल की सैन्य कार्रवाई की खुलकर आलोचना की। तुर्की के राष्ट्रपति Recep Tayyip Erdogan ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ग़ज़ा में मानवीय संकट का मुद्दा उठाया और इज़राइल पर अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के आरोप लगाए। एर्दोगान लंबे समय से फिलिस्तीन के समर्थन में मुखर रहे हैं, लेकिन इस बार उनके बयान पहले से ज्यादा तीखे और सीधे थे। उन्होंने पश्चिमी देशों की नीतियों पर भी सवाल उठाए और मुस्लिम देशों से एकजुट रुख अपनाने की अपील की।
दूसरी ओर, नेतन्याहू ने स्पष्ट किया है कि इज़राइल की प्राथमिकता राष्ट्रीय सुरक्षा है। उनका कहना है कि हमास जैसे संगठनों के खिलाफ कार्रवाई आत्मरक्षा का हिस्सा है। नेतन्याहू की राजनीति लंबे समय से “सुरक्षा पहले” के सिद्धांत पर आधारित रही है। इज़राइल के भीतर भी सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा चुनावी और राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है। ऐसे में तुर्की के कड़े बयानों का जवाब भी इज़राइल ने कूटनीतिक सख्ती से दिया है।

हालांकि अब तक दोनों देशों के बीच सीधा सैन्य टकराव नहीं हुआ है, लेकिन कूटनीतिक रिश्तों में खटास साफ दिखाई दे रही है। तुर्की ने व्यापारिक और राजनयिक स्तर पर कुछ कदम उठाने के संकेत दिए हैं। वहीं इज़राइल ने भी अपने रुख में नरमी नहीं दिखाई। विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव सिर्फ दो देशों के बीच नहीं, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय समीकरण का हिस्सा है।
मध्य-पूर्व में कई शक्तियां सक्रिय हैं—ईरान, सऊदी अरब, अमेरिका और यूरोपीय देश—सभी के अपने-अपने हित जुड़े हैं। तुर्की खुद को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, जो मुस्लिम दुनिया की आवाज़ बन सके। वहीं इज़राइल अपने सुरक्षा ढांचे और पश्चिमी समर्थन पर भरोसा करता है। इस पृष्ठभूमि में तुर्की-इज़राइल तनाव का असर सिर्फ द्विपक्षीय नहीं, बल्कि बहुपक्षीय हो सकता है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या नेतन्याहू का “खेल फेल” हो रहा है? इस सवाल का जवाब इतना सीधा नहीं है। एक तरफ़ इज़राइल के भीतर कुछ वर्ग सरकार की नीतियों की आलोचना कर रहे हैं, खासकर अंतरराष्ट्रीय दबाव और मानवीय संकट के मुद्दे पर। दूसरी तरफ़ नेतन्याहू के समर्थक मानते हैं कि सख्त रुख ही इज़राइल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। घरेलू राजनीति, अदालतों में चल रहे मामलों और गठबंधन की मजबूती भी उनकी स्थिति को प्रभावित करती है।

तुर्की के लिए भी यह मामला सिर्फ विदेश नीति का नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति से जुड़ा है। एर्दोगान अपने समर्थकों के बीच मजबूत छवि बनाए रखना चाहते हैं और खुद को फिलिस्तीन के समर्थक नेता के रूप में पेश करते हैं। इससे उन्हें क्षेत्रीय और धार्मिक समर्थन मिलता है। लेकिन साथ ही तुर्की की अर्थव्यवस्था और पश्चिमी देशों से उसके संबंध भी एक संतुलन की मांग करते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले महीनों में तीन संभावनाएं बन सकती हैं। पहली—तनाव बयानबाज़ी तक सीमित रहे और पर्दे के पीछे कूटनीतिक बातचीत जारी रहे। दूसरी—आर्थिक या व्यापारिक प्रतिबंधों के जरिए दबाव की राजनीति बढ़े। तीसरी—अगर क्षेत्र में कोई बड़ी सैन्य घटना होती है, तो तनाव और गहरा सकता है। हालांकि फिलहाल पूर्ण युद्ध की संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि दोनों देश जानते हैं कि सीधा टकराव पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस स्थिति पर नजर रखे हुए है। अमेरिका और यूरोपीय देश संतुलन बनाने की कोशिश में हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र मानवीय सहायता और युद्धविराम की अपील कर रहा है। तुर्की ने खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश करने की भी कोशिश की है, हालांकि इज़राइल इस पर कितना भरोसा करेगा, यह अलग सवाल है।
कुल मिलाकर, यह कहना कि नेतन्याहू का खेल पूरी तरह फेल हो गया है, अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि तुर्की के सख्त रुख ने इज़राइल पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाया है और क्षेत्रीय राजनीति को और जटिल बना दिया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश संवाद का रास्ता चुनते हैं या बयानबाज़ी और प्रतिबंधों का दौर जारी रहता है।
मध्य-पूर्व की राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती—हित स्थायी होते हैं। इसलिए संभव है कि आज का टकराव कल किसी नई समझ या समझौते में बदल जाए। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर है कि क्या यह तनाव बड़े बदलाव की शुरुआत है या फिर एक और कूटनीतिक अध्याय, जो समय के साथ शांत हो जाएगा।