diwali horizontal

SIR की आड़ में चुनावी गेम? विपक्ष आगबबूला!

0 72

SIR की आड़ में चुनावी गेम? विपक्ष आगबबूला!

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों *SIR (Special Intensive Revision)* को लेकर तहलका मचा हुआ है। यह सिर्फ मतदाता सूची का तकनीकी अपडेट नहीं रहा, बल्कि विपक्ष इसे एक बड़े चुनावी हथियार के तौर पर देख रहा है। सूरत यह है कि संपूर्ण प्रदेश में 22 साल बाद SIR के ज़रिए मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण किया जा रहा है, और चुनाव आयोग का दावा है कि इससे डुप्लिकेट वोट हटेंगे, नए वोटर आएँगे और सूची पहले से सटीक बनेगी। लेकिन विपक्ष कह रहा है — यह प्रक्रिया बीजेपी को फायदा पहुँचाने के लिए है और चुनाव से पहले “वोट कटाने” की साजिश है।

 

मुख्य आरोप* यह है कि SIR के ज़रिए कई वोटर्स को सूची से निकाला जा रहा है — खासकर उन इलाकों में जहाँ बीजेपी को चुनौती मिलने की उम्मीद है। समाजवादी पार्टी (SP) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री *अखिलेश यादव* ने तो SIR को लेकर *सुप्रीम कोर्ट* तक जाने की बात कही है, क्योंकि उनका कहना है कि चुनाव आयोग आधार कार्ड को मतदाता पहचान पत्र (मतदाता सूची) में जोड़ने से इनकार कर रहा है, जिससे बहुत सारे असली वोटर्स पर बैन पड़ सकता है।और ये आरोप सिर्फ SP तक ही सीमित नहीं हैं

शिवपाल यादव ने भी बीजेपी पर गंभीर इल्ज़ाम लगाए हैं, जिनका कहना है कि SIR “भ्रष्टाचार का तरीका” है और उसे बीजेपी अपने लिए वोट बैंक बनाने का साधन बना रही है। ([साथ ही, *कांग्रेस* ने भी SIR प्रक्रिया को “वोट कटौती का खेल” बताया है और कहा है कि चुनाव आयोग और बीजेपी एक साथ मिलकर चुनाव की लड़ाई पहले ही जीतने की रणनीति बना रहे हैं।
दरअसल, चुनाव आयोग ने 12 राज्यों में SIR लागू करने का ऐलान किया है, और कहा गया है कि करीब *51 करोड़ वोटर* इस प्रक्रिया के दायरे में आएँगे।]) इस बहुत बड़े स्केल की प्रक्रिया ने विपक्ष के साथ-साथ आम जनता में भी चिंता पैदा कर दी है — क्योंकि यदि सूची में बड़ी संख्या में नाम कट जाएँ या गलत तरीके से पुनरीक्षित किए जाएँ, तो यह सीधा असर लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा पर कर सकता है।

लेकिन बीजेपी और चुनाव आयोग अपने प्रस्ताव का बचाव भी कर रहे हैं। उनकी दलील है कि यह कदम ज़रूरी है ताकि वोटर सूची “पारदर्शी, साफ़ और त्रुटि-मुक्त” बने। उनका कहना है कि इस तरह की गहन समीक्षा लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है।

इस बीच, *एसपी* ने एक और गंभीर मांग उठाई है — उन्होंने BLOs (बूथ-लेवल अधिकारियों) और EROs (इलेक्शन रेजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स) को हटाने की मांग की है, क्योंकि उनका दावा है कि ये अधिकारी जाति-धर्म के आधार पर तैनात किए गए हैं, जिसका दुष्प्रभाव SIR की निष्पक्षता पर
कांग्रेस की हालत भी दिलचस्प है — इन खबरों के मुताबिक, वह SIR में बहुत कम ‘बूथ एजेंट’ नियुक्त कर पाई है, जिससे उनकी निगरानी और असर सीमित हो सकता है। ऐसा न लगे कि वे पूरी तरह प्रक्रिया में शामिल हैं — और यह विपक्षियों के लिए एक बड़ा नुकसान हो सकता है।

अगर बीजेपी को इस SIR प्रक्रिया से वाकई फायदा हो रहा है, तो इसका बड़ा मतलब एक बात का हो सकता है — *मतदाता सूची को अपने राजनीतिक फायदों के लिए मोड़ना*। यह न केवल चुनाव की तैयारी का हिस्सा है, बल्कि एक रणनीतिक कदम जैसा दिखता है जो भविष्य के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को मदद कर सकता है।

नतीजतन, SIR को लेकर यूपी में जो हंगामा है, वह सिर्फ वोटर सूची बदलने का मामला नहीं है — यह राजनीतिक सत्ता, लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी रणनीति का गहन संघर्ष बन गया है। अगर यह प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं हुई, तो विपक्ष का दावा है कि यह “लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों” के खिलाफ हो सकता है। और अगर निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से हुआ, तब भी यह देखने वाली बात होगी कि इस बड़े कैंपेन का वोटर्स के वास्तविक अधिकारों पर क्या स्थायी असर पड़ता है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.