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आजादी के सात दशक बाद भी किसान बेहाल

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मसौली बाराबंकी :  वोटो की सबसे बड़ी जमात किसानों के स्तर को उठाने के लिए हर दल हर नेता चुनाव के दौरान बड़े बड़े सब्ज़बाग दिखाकर वोट तो हासिल कर लेते है परन्तु आज तक किसी भी दल व नेता ने उन किसानों के लिए कोई नीति व योजना नही बनायी जो हमारे देश के वास्तविक किसान है दुसरो की भूमि को बटाई के रूप में खेती करने वाले किसान भूमि के मालिक तो नही है परन्तु खेतो में अनाज को पैदा करने की जिम्मेदारी इन्ही किसानों के कन्धों पर है

आजादी के सत्तर साल बीतने के बाद भी भारत में किसान बदहाल बना हुआ है। इन सात दशकों में जितनी भी सरकारें आई और गई, इनमें से ज्यादातर ने किसान को राजनीति का जरिया बना कर अपना उल्लू सीधा किया है। किसान को लेकर राजनीति तो होती रही लेकिन दुर्भाग्य है कि उसको लेकर कोई कारगर नीति अभी तक नही बनी है। किसानों के हित और उनकी आर्थिक तरक्की की दुहाइयां भी हर नेता और दल देता रहा लेकिन व्यवहारिकता के धरातल पर कोई काम नही हुआ

खेती हर समय अजीब विरोधाभास के बीच झूलती है एक तरफ किसान फसल नष्ट होने पर मर रहा है तो दूसरी ओर अच्छी फसल होने पर वाजिब दाम न मिलने पर भी मौत को गले लगा रहा है।दोनों ही मसलो में मांग केवल मुआवजे राहत की है जबकि यह देश के हर गांव के हर किसान की शिकायत है कि सूखा, बाढ़ एव ओलावर्ष्टि नुकसान के जायज का गणित ही गलत है और यही कारण है कि किसान जब कहता है कि उसकी पूरी फसल ही चौपट हो गई तो सरकारी रिकार्ड में उसकी हानि 15 से 20 प्रतिशत दर्ज कर राहत के नाम पर सौ दो सौ से लेकर हजार तक मुआवजा देकर मीडिया एव जनसभाओं में किसानों का मजाक उड़ाया जाता है

सरकारों की तरफ से कृषि कर्ज माफी की घोषणा होने पर भू-स्वामी किसानों में खुशी की लहर दौड़ जाती है परन्तु जाड़ा, बरसात एव चिलचिलाती गर्मी में पसीना बहा कर अनाज को पैदा करने वाले बटाईदार किसान मायुष हो जाते है क्योंकि इन किसानों के पास अपनी खुद की कोई भूमि नही होती है दुसरो की भूमि को बटाई पर लेकर जिंदगी का निर्वाहन करते है।देश में अमूमन चार तरह के किसान होते हैं.एक बड़े जोत का किसान जिसके पास बारह-पंद्रह बीघा या इससे भी अधिक जमीन है. दूसरा मध्यम जोत का काश्तकार जिसके पास पांच-छह बीघा जमीन है. तीसरा लघु किसान जिसके पास तीन बीघा से भी कम जमीन है. चौथा भूमिहीन बटाईदार किसान जिसके पास अपनी कोई जमीन नहीं होती और वे दूसरों की जमीन पर बटाई करते हैं। सरकार द्वारा किसानों के हित के लिए चलाई जाने वाली किसी भी योजना का लाभ बटाई दार किसानों को नही मिलती है। कर्ज माफी या कृषि संबंधी अन्य लाभकारी योजनाओं का ज्यादातर लाभ बड़े किसानों को ही मिलता है. जबकि किसानों के बीच एक बड़ा तबका भूमिहीन बटाईदार किसानों का भी है, जिसे कर्ज माफी से कभी कोई राहत नहीं मिली है । बटाईदार किसान को न तो किसान क्रेडिट कार्ड का फायदा मिलता है और न ही सरकार की अन्य योजनाओं का लाभ मिलता है हद तो तब हो जाती है

जब बटाईदार किसान अच्छी उपज को तैयार करता है तो वाजिब दाम के लिए सरकारी क्रय केन्द्रों पर उपज को बेच नही सकता क्योकि वह भूमि मालिक किसान नही है नतीजा यह है कि बटाईदार किसान अपनी मेहनत को ओने पौने दामो में बिचौलियों के हाथ बेचने को मजबूर रहते है। इसी के उलट भूमिधर किसान जिनके नाम भूमि है वह खेती के नाम पर बैंको से केसीसी से लेकर हर तरह के ऋण लेकर कस्बो में दुकान एव अन्य धन्धा कर मुनाफा कमाते है और फसल का भरपूर लाभ भी लेते है। यही नतीजा है कि हमारे देश से अमीरी एव गरीबी के बीच के फासले को खत्म नही किया सका और अमीर दिनपर दिन अमीर ,गरीब दिनपर दिन गरीब होता जा रहा है

लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव किसान नेताओ के लॉलीपॉप में हमेशा फँसता रहता है जिसका ही कारण है कि हर किसान की जुबान पर बस एक ही शब्द रहता है सरकार चाहे जिसकी बने हमे तो खेती ही करना है और नेताओं की कठपुतली बनना है

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