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स्त्रीत्व की स्वतंत्रता : श्रद्धा मौर्या

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स्त्रीत्व की स्वतंत्रता

 

 

मनोरंजन: हर स्त्री की दोहरी है,

आजादी की यह कहानी,

कहने को तो सालों पहले ही मिली,

देश को यह पहली आजादी

पर आजाद होकर भी,

वो अपने स्त्रीत्व को न पहचानी,

अब हम सबको मिलकर है,

अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी,

उसे हर कदम पर आत्मनिर्भर बनाकर,

उन्हें दूसरी व्यावहारिक स्वतंत्रता है दिलानी।

 

‘स्त्रीत्व की आज़ादी’ की समीक्षा

लेखक : अली

 

कवयित्री श्रद्धा की इन पंक्तियों में बहुत ही गहराई है। क्योंकि वह स्वयं भी स्त्री है इस वजह से उसने स्त्री की उस आजादी की बात की है जिन पर शायद आज भी हमारा समाज कहीं ना कहीं खामोश रहता है या फिर अंजान बनने की कोशिश करता है। किसी हद तक तुकबंदी की वर्जनाओं से दूर इन पंक्तियों में स्त्री के कई किरदारों का वर्णन किया गया है। हालांकि लेखिका ने शब्द ‘दोहरी’ का इस्तेमाल किया है। जिसमें सभी के सभी किरदार सिमट कर आ गए हैं। इस ‘दोहरी’ के पीछे सिर्फ दो किरदार नहीं है बल्कि कई है। एक लड़की जन्म लेने के बाद बेटी के रूप में अपनी जीवन यात्रा शुरू करती है। अगर वो अपने माता पिता की दूसरी संतान है तो पैदा होने के समय से उसका ‘बहन’ रूपी किरदार भी शुरू हो जाता। फिर शनै: शनै: पत्नी, भाभी, माता, चाची, मामी, बुआ, दादी, नानी और न जाने कितने और किरदारों को बहुत ही सलीके से अदा करती चली जाती है। कहने को तो स्त्री समाज में स्वतंत्र है। पर क्या नारी वाकई आज़ाद है? यह यक्ष प्रश्न कवित्री श्रद्धा ने समाज के सामने रखा है। कवित्री कहना चाहती है की नारी इन किरदारों के बंधनों में बंधी हुई है। स्वतंत्र होकर भी वह आज़ाद नहीं है। श्रद्धा लिखती है- “वह अपने स्त्रीत्व को ना पहचानी” मेरे विचार से श्रद्धा यहां पर यह कहना चाहती है कि अपने किरदारों को निभाते निभाते महिला इन बंधनों में इतनी ज्यादा जकड़ गई है कि उसे अपना स्त्री होना भी याद नहीं रहा। उसने अपने मन को मार लिया है। हर तरह की जिम्मेदारी उसने निभाई। अपने आसपास के लोगों को खुश करने के लिए उसने वह सब कुछ किया जो वह कर सकती थी। लेकिन उसके आसपास, इर्द-गिर्द रहने वाले और घूमने वाले किसी भी व्यक्ति को यह ख्याल नहीं आया कि उसके भी कुछ अपने स्वतंत्र विचार है। उसकी भी कुछ अपनी स्वयं की जिंदगी है। उसकी भी कुछ अपनी इच्छाएं हैं, जिज्ञासाएं हैं, प्रतिक्रियाएं हैं। वह भी कुछ जानना चाहती है, कुछ समझना चाहती है, कुछ समझाना चाहती है, कुछ सोचना चाहती है, कुछ नया करना चाहती है, अपने विचारों को आयाम देना चाहती है। पर क्या हमारे समाज ने उसे यह स्वतंत्रता दी है ? स्त्री क्या वह सब कुछ कर सकती है जिसकी इच्छा उसका स्त्रीत्व करता है। या वह करना चाहती है। क्या हमारा समाज उसे इन बंधनों से आजाद करके वह व्यावहारिक स्वतंत्रता प्रदान करेगा जिसकी वह इच्छा रखती है? कवित्री श्रद्धा कि इस गहराई वाली कविता में वह इसी व्यावहारिक स्वतंत्रता के ऊपर बल देती हुई नजर आ रही है। देखने में तो स्त्री स्वतंत्रता प्रतीत होती है पर वास्तविकता यह है कि वह व्यावहारिक रूप से स्वतंत्र नहीं है। श्रद्धा ने पूरी श्रद्धा के साथ स्त्री की उसे दूसरी व्यवहारिक स्वतंत्रता की वकालत की है जिसकी वह हकदार है। वह समाज का आह्वान करती है और कहती है कि सबको मिलकर के उसे यानी कि स्त्री को आत्मनिर्भर बनाना है और उसे व्यवहारिक आजादी दिलानी है। वह आजादी या स्वतंत्रता जिसे वह बहुत पहले मिल जानी चाहिए थी।

 

 

(समीक्षक वरिष्ठ पत्रकार है और आकाशवाणी के संवाददाता है)

 

श्रद्धा मौर्य

प्रतापगढ़

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