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गाज़ा बना कर्बला!

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गाज़ा बना कर्बला!

अंतर्राष्ट्रीय: ग़ाज़ा की आज की स्थिति बेहद दुखद और भयावह है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने इसे “आज का कर्बला” बताया है।

उन्होंने कहा कि इतिहास में जब इमाम हुसैन (रज़ि.) ने सच्चाई, इंसाफ और इंसानियत के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था, तब वे अकेले छोड़ दिए गए थे।

आज वही कहानी ग़ाज़ा में दोहराई जा रही है, जहां सैकड़ों मासूम लोग—बच्चे, महिलाएं और बूढ़े—हर दिन मारे जा रहे हैं, लेकिन दुनियाभर के 58 मुस्लिम देश चुप्पी साधे हैं। यह चुप्पी किसी तरह की मौन सहमति जैसा लगती है।

ग़ाज़ा में पिछले कई महीनों से भयंकर संकट है। रोज़मर्रा की ज़िंदगी मुश्किल हो चुकी है क्योंकि पानी, खाने, दवाइयां और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतें न के बराबर हैं। अस्पतालों में बेड, दवाइयां, ऑक्सीजन की भारी कमी है। यहां नवजात शिशु भी एक ही इनक्यूबेटर में कई बच्चों को रखा जाता है। राहत कार्यों की लाइनें लगी हैं, लेकिन मदद के लिए आने वाले लोग भी हमलों का शिकार हो रहे हैं। ख्वाजा आसिफ ने बताया कि पिछले 24 घंटे में 78 और लोग मारे गए हैं। इस बीच कतर में संघर्ष विराम की बातचीत चल रही है, लेकिन फिलहाल कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है।

आसिफ ने मुस्लिम देशों से सवाल किया कि क्या वे इस दर्दनाक स्थिति को बस यूं ही देखेंगे या कोई आगे आएगा और आवाज़ उठाएगा। उन्होंने कहा कि कर्बला की सीख हमें याद दिलाती है कि सत्य और इंसाफ के लिए खड़े होना जरूरी है, भले ही इसके लिए बड़ा बलिदान क्यों न देना पड़े। उन्होंने अपील की कि दुनिया के सामने ग़ाज़ा में हो रही त्रासदी को एक मानवीय आपदा के रूप में देखा जाए न कि किसी राजनीतिक संघर्ष के तौर पर।

ग़ाज़ा के लोग कई दिनों से पानी, खाने और दवा के लिए तड़प रहे हैं। अस्पतालों की हालत इतनी खराब है कि डॉक्टर और नर्स भी थक गए हैं। बच्चे भूख और बीमारी से जूझ रहे हैं। कई जगहों पर हवाई हमलों ने स्कूल, अस्पताल और घरों को तबाह कर दिया है। राहत सामग्री पहुँचने में देरी और ब्लॉकेड के कारण हालत और बिगड़ रही है।

इस संकट की गंभीरता को समझने के लिए हम पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान को सुनना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा, “आज ग़ाज़ा में जो दर्द है, वह कर्बला के दर्द से कम नहीं। अगर हम इतिहास से सीखें, तो हमें चाहिए कि हम आवाज़ उठाएं और इस मानवता की लड़ाई में पीछे न हटें।”

यह समस्या सिर्फ ग़ाज़ा या मध्य पूर्व की नहीं है, बल्कि पूरी मानवता की है। जब मासूम बच्चे भूखे मर रहे हों, महिलाओं और बुजुर्गों की जान जा रही हो, तो यह हम सभी की जिम्मेदारी बनती है कि हम इस पर आवाज़ उठाएं, मदद करें और शांतिपूर्ण समाधान खोजें।

आज के समय में सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया के कारण हम सीधे ग़ाज़ा के अंदर की बातें देख सकते हैं। कई पत्रकार, स्थानीय लोग और राहत कार्यकर्ता अपनी रिपोर्ट्स और वीडियो साझा कर रहे हैं, जिससे पता चलता है कि वहां का हाल कितना बदतर हो चुका है।

आशा करते हैं कि जल्द ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मानवता के संकट को समझेगा और ग़ाज़ा के लोगों की मदद के लिए ठोस कदम उठाएगा। जब तक यह संभव नहीं होता, तब तक हम सबकी यह जिम्मेदारी है कि हम इस दुखद स्थिति को नजरअंदाज न करें और जो मदद कर सकते हैं, करें।

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