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गाज़ा की आख़िरी चीख़,क़ब्रिस्तान बना गाज़ा शहर।

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गाज़ा की आख़िरी चीख़,क़ब्रिस्तान बना गाज़ा शहर

गाजा न्यूज: गाज़ा में चल रहा नरसंहार आज की सबसे दर्दनाक ख़बर बन गया है। हर तरफ़ तबाही का मंज़र है – टूटे हुए घर, रोते हुए बच्चे, और डर से सहमे हुए लोग। आज की ताज़ा ख़बर के मुताबिक़, इज़राइल की बमबारी में फिर से कई बेगुनाह लोगों की जान चली गई। मरे हुए लोगों में ज़्यादातर औरतें, बच्चे और बुज़ुर्ग हैं, जो इस जंग में शामिल भी नहीं थे, लेकिन सबसे ज़्यादा नुकसान उन्हीं को हो रहा है।

हर रोज़ नई तसवीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं, जिनमें सिर्फ़ चीख़-पुकार, धुआं और तबाही नज़र आती है। हॉस्पिटल भरे पड़े हैं, दवाइयाँ ख़त्म हो चुकी हैं, और पीने का पानी तक लोगों को मयस्सर नहीं है। जो लोग ज़िंदा हैं, वो भी हर पल मौत के साये में जी रहे हैं।दुनिया की बड़ी ताक़तें, यूनाइटेड नेशंस और इंसानी हक़ की तंज़ीमें बार-बार चिंता जता रही हैं, लेकिन ज़मीन पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा। लोगों का एक ही सवाल है – आख़िर इस ज़ुल्म का हिसाब कौन देगा? जो मासूम बच्चे मारे गए, जो माएं अपने लहूलुहान बच्चों को गोद में लेकर रो रही हैं, क्या उनका कोई कसूर था?

आज की ख़बर में यह भी बताया गया है कि कुछ विदेशी डॉक्टर और वालंटियर जो मदद के लिए आए थे, वो भी इस बमबारी का शिकार हो गए। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि गाज़ा एक ज़िंदा क़ब्रिस्तान बन गया है। हर घर में मातम है, हर गली में ख़ून बिखरा पड़ा है।

सोशल मीडिया पर लोग आवाज़ उठा रहे हैं, कई देशों में लोग सड़कों पर उतर कर एहतजाज कर रहे हैं। लेकिन जिन नेताओं के हाथ में दुनिया की क़ियादत है, वो अब तक ख़ामोश हैं। क्या उनका कोई फर्ज़ नहीं बनता? क्या इंसानियत सिर्फ़ किताबों में रह गई है?

गाज़ा की ज़मीन पर जो हो रहा है, वो सिर्फ़ जंग नहीं है – ये इंसानियत के ख़िलाफ़ एक बड़ा जुर्म है। और हर जुर्म का हिसाब होता है। एक दिन ज़रूर ये सवाल उठेगा – इतने बेगुनाह क्यों मारे गए? और दुनिया चुप क्यों रही?

जब तक ज़ालिम के ख़िलाफ़ सख़्त कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक गाज़ा में ख़ून बहता रहेगा। और हर दिन एक नया मासूम शहीद होगा, जिसकी सिसकी ये कहेगी – “मेरा क्या क़सूर था?”

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