
कृषि विधेयक बिल के विरोध में गांधीवादी चिंतक ने रखा उपवास
बाराबंकी : किसान और कारपोरेट के बीच सरकार बिचैलिया है। किसान विरोधी कानून सम्पति के मौलिक अधिकार का हनन है। किसान को दान नहीं उसे उसका अधिकार चाहिए। उसे उसके फसल का सही दाम मिलना चाहिए। लड़ाई दाम और किसानी बचाने की है। खेती कंपनियों के हाथ में न जाए उसकी लड़ाई किसान लड़ रहे हैं। ऐसे में सरकार किसान कानून को रद्द करने का विचार करे। यह बात केंद्र सरकार के कृषि से जुड़े तीन विधेयकों के विरोध में नगर के गाँधी भवन में उपवास पर बैठे गांधीवादी चिंतक राजनाथ शर्मा ने कही। श्री शर्मा ने सामाजिक न्याय के प्रणेता डॉ भीमराव अम्बेडकर की पुण्यतिथि पर उनके चित्र और महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने उपरान्त सत्याग्रह प्रारम्भ किया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अन्नदाता के साथ धोखाधड़ी कर रही है।
आत्मनिर्भरता का नारा देकर विदेशी कंपनियों और भारतीय कॉरपोरेट जगत को किसानों के साथ लूट मचाने का निमंत्रण दे रही है। गांधीवादी राजनाथ शर्मा ने कहा कि सरकार ने कोरोना काल फायदा उठाकर तीन अध्यादेश किसानों पर लागू किए हैं। जिसके विरोध में किसान दिल्ली और देशभर में किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। राजनाथ शर्मा ने 8 नवंबर को भारत बंद का समर्थन करते हुए कहा कि किसान देश की सम्पन्नता का प्रतीक है। इसी लिए भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है। जबकि सरकार की नीतियों ने किसानों की कमर तोड़ डाली है। इस काले कानून खत्म करना ही न्याय संगत होगा। श्री शर्मा ने कहा कि पहले अमेरिका का पीएल 480 गेहूँ खाया जाता था। 1967 के बाद देश की सियासत में कई कृषक राजनेता सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे। जिनकी नीतियों से देश अन्न के उत्पादन पर आत्मनिर्भर हुआ।
आज भारत पर अमेरिका की पाबंदियों का असर इसलिए नही पड़ रहा है क्योंकि भारत में अनाज का उत्पादन बेहतर हुआ है। तहसील फतेहपुर बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं समाजवादी चिंतक यादवेंद्र सिंह यादव ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि विधेयक से खेती की लागत महंगी हो जाएगी, फसल के दाम गिर जाएंगे, कालाबाजारी और मुनाफाखोरी बढ़ जाएगी और कार्पोरेटों का हमारी कृषि व्यवस्था पर कब्जा हो जाने से खाद्यान्न आत्मनिर्भरता भी खत्म जो जाएगी। यह किसानों और ग्रामीण गरीबों की बर्बादी का कानून है।