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“I Love Mohammad” के बाद अब “I Love Mahadev” 

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“I Love Mohammad” के बाद अब “I Love Mahadev” 

Uttar Pradesh Live: उत्तर प्रदेश में “I Love Mohammad” पोस्टर विवाद ने अब वाराणसी तक रंग ले लिया है। कानपुर में इस बयान के चलते प्रारंभ हुए धार्मिक-राजनीतिक तनाव के बीच, काशी (वाराणसी) के साधु-संतों ने इसे सांप्रदायिक चुनौती माना।

और शुक्रवार को बड़े पैमाने पर ‘I Love Mahadev’ पोस्टर अभियान का ऐलान कर दिया। अस्सी इलाके के सुमेरु पीठ में सुबह से ही संतों की बैठक हुई, जिसमें हिंदू धार्मिक संगठनों और मठाधीशों ने भाग लिया। वहाँ से निकलकर उन्होंने हाथों में “I Love Mahadev” लिखे बैनर-पोस्टर लिए शंखनाद किया, “हर हर महादेव” के जयघोष लगाए,

और इसे काशी की गलियों, मंदिरों और चौराहों तक पहुँचाया। उनका दावा है कि यह कदम “देश को अस्थिर करने की साजिश” का जवाब है।

पूरी तैयारी के साथ उन्होंने आदेश दिया कि काशी के सभी 84 घाटों पर “I Love Mahadev” पोस्टर लगाए जाएँ और स्थानीय नागरिकों से कहा गया कि वे अपने घरों एवं आस-पास के क्षेत्र में महादेव‑पैनल लगाएँ। इस बीच धर्माचार्यों ने कड़े शब्दों में कहा कि “मोहम्मद से नहीं, महादेव से है काशी की पहचान”। पातालपुरी मठ के जगद्गुरु बालकदेवाचार्य ने आरोप लगाया कि “विदेशी फंडिंग” के जरिए इस तरह के पोस्टर अभियान चलाए जा रहे हैं, जो काशी और देश के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने वाले हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन और सरकार इस तरह की गतिविधियों को नहीं रोकेगी, तो 5 करोड़ साधु-संत सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं।

दरअसल, यह विवाद तब शुरू हुआ जब कानपुर में “I Love Mohammad” नामक पोस्टर या बैनर एक धार्मिक जुलूस मार्ग पर लगाए गए, जिसे हिंदू संगठनों ने आपत्तिजनक माना। वहां पुलिस ने संबंधित लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। [1]) इस घटना ने सोशल मीडिया पर तू फान सा मचा दिया, और #ILoveMohammad नाम की मुहिम अनेक जिलों तक फैल गई। ([])

अब वाराणसी में संतों की इस प्रतिक्रिया को कुछ लोग प्रतिशोधी और उत्तेजक कदम कह रहे हैं, तो कुछ इसे धर्म और संस्कृति की रक्षा का एक संघर्ष मान रहे हैं। नगरधर्माचार्यों ने बताया कि सिगरा थाना इलाके में पहले कुछ नाबालिग युवकों द्वारा “I Love Mohammad” पोस्टर लिए जुलूस निकाला गया, जिसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इसके बाद पुलिस ने उस घटना के सिलसिले में 20 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। ([ABP News][3]) धर्माचार्यों ने यह सवाल भी उठाया कि अगर “I Love Mohammad” पोस्टर लगे तो उस पर उचित कार्रवाई हो, और यदि “I Love Mahadev” पोस्टर लगे, तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? उन्होंने कहा कि यह दोगलापन है और प्रशासन को निष्पक्ष होना चाहिए।

प्रशासन की तरफ से फिलहाल यह कहा गया है कि स्थिति पर पूरी नजर है। वाराणसी पुलिस कमिश्नरेट एवं स्थानीय थानों को सतर्क रहने का निर्देश दिया गया है। यदि सार्वजनिक व्यवस्था को संकट हो, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। कुछ सूत्रों का कहना है कि पोस्टर और बैनर अभियान बिना अनुमति, और संभवतः विभिन्न संगठनों द्वारा सुनियोजित तरीके से चलाया जा रहा है, इसलिए इसे “मिसयूज़ ऑफ़ धार्मिक भावनाएँ” के दायरे में देखा जा रहा है।

समाज में इस विवाद के प्रति मिश्रित प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। एक ओर, हिंदू संगठनों और भक्तगण इसे अपनी आस्था और सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई कह रहे हैं, वहीं अन्य लोग इसे सामाजिक तनाव व विभाजन की ओर धकेलने वाला कदम बता रहे हैं। कुछ बुद्धिजीवी तथा सामाजिक कार्यकर्ता इस तरह की घटनाओं पर मंथन कर रहे हैं कि धार्मिक भावनाओं के नाम पर किस हद तक स्वतः अभिव्यक्ति अनुमति हो, और किस हद पर कानून और सार्वजनिक व्यवस्था को प्राथमिकता देना चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत शायद स्पष्ट कर दिया है: यूपी सहित देश के कई हिस्सों में धार्मिक-चिन्हचालन अब केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक सामुदायिक, राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष का माध्यम बन गया है।वाराणसी जैसे प्राचीन, धार्मिक नगरी में यह बयान विशेष संवेदनशीलता लिए है। यदि इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया नहीं गया, तो आगे बड़े आंदोलन, प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था तनाव को जन्म मिलने की संभावना है।

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