diwali horizontal

पिक्चर अभी बाकी है?

0 46

पिक्चर अभी बाकी है?

Iran America Middle East Tension: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह की बयानबाज़ी और सैन्य हलचल देखने को मिली, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान में जंग टल गई है या फिर यह सिर्फ तूफान से पहले की शांति है? बाहर से देखने पर ऐसा लग सकता है कि अमेरिका दबाव बना रहा है और ईरान पीछे हट रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

डोनाल्ड ट्रंप की नीति हमेशा से आक्रामक रही है। वह दबाव बनाकर सामने वाले को झुकाने की रणनीति अपनाते रहे हैं, चाहे वह चीन हो, उत्तर कोरिया हो या ईरान। लेकिन ईरान कोई आम देश नहीं है और न ही उसके नेतृत्व को इतनी आसानी से डराया जा सकता है। अयातुल्लाह अली खामनेई पिछले कई दशकों से सत्ता में हैं और उन्होंने युद्ध, प्रतिबंध और अंतरराष्ट्रीय साज़िशें बहुत करीब से देखी हैं। उन्हें मादुरो या किसी कमजोर नेता से तुलना करना अमेरिका की सबसे बड़ी भूल हो सकती है।

अमेरिका शायद यह सोच बैठा था कि ईरान भी वेनेजुएला की तरह आर्थिक दबाव में टूट जाएगा। लेकिन ईरान की व्यवस्था बिल्कुल अलग है। ईरान में सत्ता सिर्फ एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है, बल्कि वहां धार्मिक नेतृत्व, सेना और जनता के बीच एक मज़बूत तालमेल है। रिवोल्यूशनरी गार्ड्स यानी IRGC केवल सेना नहीं, बल्कि एक विचारधारा है, जो देश की संप्रभुता के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

ईरान की सैन्य ताकत को अक्सर कम आंका जाता है। उसके पास आधुनिक मिसाइल तकनीक है, ड्रोन क्षमता है और सबसे बड़ी बात — पूरे मिडिल ईस्ट में उसके सहयोगी मौजूद हैं। लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हूती, इराक और सीरिया में समर्थक गुट — यह सब ईरान को एक क्षेत्रीय शक्ति बनाते हैं। अमेरिका अगर ईरान पर सीधा हमला करता है, तो जवाब सिर्फ ईरान से नहीं आएगा, बल्कि पूरा इलाका आग में झुलस सकता है।

यही वजह है कि अमेरिका कदम फूंक-फूंक कर रख रहा है। बाहर से चाहे सख्त बयान दिए जाएं, लेकिन अंदरखाने वॉशिंगटन जानता है कि ईरान के साथ युद्ध आसान नहीं होगा। अफगानिस्तान और इराक की असफलताओं के बाद अमेरिका एक और लंबी जंग का जोखिम नहीं लेना चाहता। अमेरिकी जनता भी अब युद्ध से थक चुकी है।

एक और बड़ी गलती जो अमेरिका ने की, वह है ईरान के अंदर सत्ता परिवर्तन को लेकर जरूरत से ज्यादा उम्मीद पालना। रेज़ा शाह पहलवी का नाम उछालकर यह संकेत देने की कोशिश की गई कि ईरान में सरकार बदल सकती है। लेकिन सच्चाई यह है कि ईरान की जनता, चाहे सरकार से असंतुष्ट हो, फिर भी विदेशी दखल को कभी स्वीकार नहीं करती। इतिहास गवाह है कि जब भी ईरान पर बाहरी खतरा आया है, जनता एकजुट हुई है।

 

ईरान और वेनेजुएला की तुलना करना इसलिए भी गलत है क्योंकि ईरान आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुका है। प्रतिबंधों के बावजूद उसने अपनी सैन्य, तकनीकी और ऊर्जा क्षमताओं को मजबूत किया है। आज ईरान सिर्फ तेल पर निर्भर देश नहीं रहा, बल्कि वह रणनीतिक सोच रखने वाला राष्ट्र बन चुका है।

फिलहाल जो स्थिति दिख रही है, उसमें अमेरिका पीछे हटता हुआ नज़र आता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खतरा पूरी तरह टल गया है। यह एक रणनीतिक ठहराव हो सकता है। दूसरी तरफ ईरान भी यह जानता है कि सीधे युद्ध में जाना आखिरी विकल्प होना चाहिए। इसलिए वह धैर्य, तैयारी और संतुलन के साथ आगे बढ़ रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ है — ईरान को कमजोर समझना या उसके नेतृत्व को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। खामनेई मादुरो नहीं हैं, और ईरान वेनेजुएला नहीं है। यह एक सभ्यता, एक इतिहास और एक मज़बूत राष्ट्रीय चेतना वाला देश है, जो दबाव में झुकने के बजाय और सख्त हो जाता है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि जंग अभी टली हुई दिख रही है, लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई है। “पिक्चर अभी बाकी है” — और इस पिक्चर में ईरान सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि कहानी की दिशा तय करने वाली ताकत बन चुका है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.