
ईरान मजबूत, अमेरिका फेल!
Iran Middle East Tension: मध्य पूर्व में हाल के समय में जो राजनीतिक तनाव बढ़ा है, उसे अगर ईरान के नजरिए से देखा जाए, तो यह सिर्फ अमेरिका और उसके कुछ सहयोगियों का खेल नहीं बल्कि ईरान की संप्रभुता और आत्मनिर्णय के ख़िलाफ़ दबाव का परिणाम कहा जा सकता है। पिछले कुछ महीनों में ईरान में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन और अंतरराष्ट्रीय बयानबाज़ी फैल रही है,
जिसमें अमेरिका ने ईरान में “हस्तक्षेप” की बात कही है और अपनी सैन्य ताकत को तैनात करने की धमकी दी है। ईरानी अधिकारियों ने बार बार स्पष्ट किया है कि ईरान युद्ध नहीं चाहता लेकिन अगर हमला किया गया तो वह खुद का पूरा बचाव करेगा, और क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाने की चेतावनी दी है — यह कहना है ईरानी विदेश मंत्री का कि ईरान की प्राथमिकताएँ शांतिपूर्ण हैं लेकिन उन्हें आक्रमण बर्दाश्त नहीं होगा।

ईरान का यह रुख इसलिए स्पष्ट है क्योंकि वह मानता है कि अमेरिका और कुछ पश्चिमी देश ईरान की आंतरिक राजनीति में दखल दे रहे हैं, और ईरान के खिलाफ बयानबाज़ी और नीतियां उसे कमजोर दिखाने की कोशिश कर रही हैं। इसी बीच ईरान ने अपने पड़ोसियों और कुछ मुस्लिम देशों से कहा है कि बाहरी सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहिए, ताकि पूरा मध्य पूर्व क्षेत्र संघर्ष और अस्थिरता की चपेट में न आ जाए। कुछ खाड़ी देशों जैसे सऊदी अरब, ओमान और कतर ने भी अमेरिका को चेताया है कि ईरान पर हमला क्षेत्रीय शांति के लिए ख़तरनाक होगा, क्योंकि इससे तेल बाज़ार और पूरे क्षेत्र की स्थिरता प्रभावित होगी, और यह संकेत देता है कि मध्य पूर्व में भारत, सऊदी, कतर जैसे देश भी हैरत और सतर्कता के साथ स्थिति देख रहे हैं।

ईरान का समर्थन केवल उसका अपना बयान ही नहीं है, बल्कि उसके कई मौजूदा सहयोगी और रणनीतिक साझेदार भी हैं, जो ईरान को क्षेत्र में अकेला नहीं छोड़ रहे। उदाहरण के लिए, ईरान ने सीरिया के राष्ट्रपति असद के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखे हैं और कई वर्षों से वहां आर्थिक तथा सैन्य सहयोग किया है। इसके अलावा ईरान, लेबनान में चीया संगठन हिज़बुल्लाह को समर्थन देता है, जो ईरान अनुकूल ताकत माना जाता है और इसका बड़ा कारण इजरायल के खिलाफ माना जाता है।

यमन में ईरान के समर्थित हौथी समूह भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और यह समूह सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय है, जिससे ईरान की कूटनीतिक तथा सैन्य पहुंच बढ़ती है। इसके अलावा, ईरान ने इराक में कई शिया मिलिशिया समूहों के साथ भी गहरा सहयोग रखा है जो उन इलाकों में प्रभावशाली हैं जहाँ अमेरिका की मौजूदगी है, और ऐसे समूह ईरान के प्रभाव को मजबूत करते हैं।
इन सब के बीच यह भी स्पष्ट है कि कई देशों के लिए ईरान सिर्फ एक विरोधी शक्ति नहीं बल्कि मध्य पूर्व में संतुलन बनाए रखने वाला एक बड़ा खिलाड़ी है। लोग और विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका की तरफ़ से ईरान को अलग थलग दिखाने का प्रयास फिलहाल सफल नहीं हो रहा है, क्योंकि ईरान की रणनीति केवल संघर्ष तक सीमित नहीं है — वह कूटनीति और क्षेत्रीय साझेदारी को भी बढ़ावा देना चाहता है। इस दिशा में ईरान ने बार बार कहा है कि वह वार्ता और शांतिपूर्ण समाधान पर भी जोर देता है, लेकिन उसे अपने आत्म रक्षा अधिकार से समझौता नहीं करने देगा।
समग्र रूप से देखा जाए तो मध्य पूर्व की राजनीति बेहद जटिल है, जहाँ ईरान के दोस्त और सहयोगी देश उसके साथ खड़े हैं और उसे तनावपूर्ण समय में समर्थन दे रहे हैं, जबकि दुश्मन देशों एवं शक्तियों के साथ उसकी टकराहट भी जारी है। ईरान की यह कोशिश कि वह खुद को बचाए और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखे, सिर्फ़ ख़ुद के लिए नहीं बल्कि एक बड़े भू राजनीतिक समीकरण के लिए अहम है। इसका असर न केवल बाहरी नीतियों पर है, बल्कि ईरान के अंदरूनी समर्थन और राष्ट्रीय भावना पर भी दिख रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ईरान अब भी क्षेत्रीय राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखने को तैयार है—काटर, ओमान और कुछ अन्य क्षेत्रों के साथ बातचीत और साझेदारी बढ़ाकर, बजाय संघर्ष में उलझने के