
लखनऊ मरकज़-ए-फ़िक़्ह व फ़क़ाहत और जमाअत-ए-जाफ़री के पारस्परिक सहयोग से छोटा इमामबाड़ा हुसैनाबाद में मजालिस-ए-अज़ा-ए-फ़ातिमियाؑ लगातार जारी हैं, जिनमें बिना किसी मज़हबी या धार्मिक भेदभाव के लोग—ख़ास तौर पर अहले-बैतؑ से मोहब्बत रखने वाले—बहुत बड़ी संख्या में शिरकत कर रहे हैं।

इस कार्यक्रम की पहली मजलिस को मौलाना सैयद ग़ुलाम महदी गुलरेज़ साहब ने ख़िताब किया, और दूसरी मजलिस को हुज्जत-उल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन मौलाना सैयद अज़ादार हुसैन साहब क़िबला (दिल्ली) ने ख़िताब किया। उन्होंने सीरत-ए-फ़ातिमी की ओर ध्यान दिलाते हुए फ़रमाया कि हमें यह समझना चाहिए कि अगर अल्लाह ने शहज़ादी-ए-कौनेनؑ को तमाम आलम की औरतों की सरदार कहा है, तो क्यों कहा है और कैसे कहा है।

इसे समझने के लिए हमें इतिहास का अध्ययन करना होगा। तब हमें पता चलेगा कि वह कौन-सी वजह थी जिसके कारण परवरदिगार ने शहज़ादी-ए-कौनेनؑ को यह अज़ीम-ओ-शान ख़िताब अता किया।जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो यह साफ़ हो जाता है कि वह शहज़ादी, जिनके सदके पूरी कायनात को पैदा किया गया, जब इस दुनिया में ज़ाहिरी तौर पर आती हैं, तो किस तरह पाकीज़गी के साथ अल्लाह की इबादतें और आज़माइशों में सब्र करती हैं।

कैसे घर-गृहस्थी के सारे काम खुद अंजाम देती हैं।और अगर घर में किसी चीज़ की कमी हो भी जाए तो कभी अपने वालिद-ए-गिरामी या अपने शौहर से शिकायत नहीं करतीं। इसी दौरान अगर कोई फ़क़ीर दरवाज़े पर आता है, तो उसे किसी हाल में ख़ाली हाथ नहीं लौटातीं। शायद यही वजह थी कि अल्लाह को शहज़ादी-ए-कौनेनؑ के ये गुण इतने पसंद आए

कि परवरदिगार ने उन्हें आलम की सारी औरतों की सरदार बनाया और ऐसी-ऐसी करामात अता कीं जिनकी कोई मिसाल पूरी कायनात में नहीं मिलती और यहीं से इस दौर की औरतों को भी सबक लेना चाहिए कि घर-गृहस्थी के काम किस तरह अंजाम देने चाहिए, और कैसे परवरदिगार के हुक्मों पर अमल करके उसका क़ुर्ब हासिल किया जा सकता है