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अमेरिकी संसद में बड़ा झटका!  ईरान पर हमला रोकने वाला प्रस्ताव फेल!

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अमेरिकी संसद में बड़ा झटका!  ईरान पर हमला रोकने वाला प्रस्ताव फेल!

IRAN -US WAR: अमेरिका की संसद में ईरान पर हमले को रोकने से जुड़ा एक अहम प्रस्ताव पास नहीं हो पाया है, जिसके बाद मध्य-पूर्व की स्थिति और ज्यादा तनावपूर्ण हो गई है। इस प्रस्ताव का मकसद अमेरिकी राष्ट्रपति को ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य हमले से रोकना था, लेकिन संसद में इसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला। इसके साथ ही यह खबर भी सामने आ रही है कि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव लगातार तेज हो रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक अमेरिका ने ईरान के करीब 20 वॉरशिप को निशाना बनाया है और लगभग 5000 मिसाइलों के जरिए कई सैन्य ठिकानों पर हमले किए गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है कि क्या दुनिया एक बड़े युद्ध की तरफ बढ़ रही है।

इस विवाद की शुरुआत तब तेज हुई जब अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और नौसैनिक गतिविधियों को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताया। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि ईरान क्षेत्र में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए लगातार सैन्य गतिविधियां कर रहा है और इससे मध्य-पूर्व में अस्थिरता बढ़ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति Joe Biden की सरकार ने कहा है कि अगर ईरान की ओर से खतरा जारी रहता है तो अमेरिका अपने सहयोगियों और सैनिकों की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।

दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिका के इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei और ईरानी सरकार के कई अधिकारियों ने कहा है कि अमेरिका की यह कार्रवाई आक्रामक है और इसका जवाब दिया जाएगा। ईरान का दावा है कि उसकी नौसेना और मिसाइल सिस्टम अभी भी मजबूत है और वह अपनी संप्रभुता की रक्षा करने में सक्षम है।

मध्य-पूर्व के कई देशों ने इस बढ़ते तनाव पर चिंता जताई है। खासकर Israel, Saudi Arabia और United Arab Emirates जैसे देशों की सुरक्षा भी इस टकराव से प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच सीधा युद्ध शुरू होता है तो इसका असर सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल सकती है।

अमेरिकी संसद में जिस प्रस्ताव पर मतदान हुआ था उसका उद्देश्य राष्ट्रपति की सैन्य कार्रवाई की शक्तियों को सीमित करना था। कई सांसदों का मानना था कि किसी भी बड़े युद्ध का फैसला सिर्फ राष्ट्रपति नहीं बल्कि संसद की मंजूरी से होना चाहिए। हालांकि प्रस्ताव को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला और इस वजह से यह पास नहीं हो पाया। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था के अंदर भी इस मुद्दे पर गहरी मतभेद मौजूद हैं।

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि 5000 मिसाइलों के हमले और कई वॉरशिप के डूबने की खबरें अगर सही साबित होती हैं तो यह हाल के वर्षों में सबसे बड़े समुद्री सैन्य टकरावों में से एक हो सकता है। आमतौर पर इस तरह की सैन्य कार्रवाई तब होती है जब दो देशों के बीच संघर्ष बहुत ज्यादा बढ़ चुका होता है। इसलिए दुनिया भर के कई देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन स्थिति पर करीब से नजर रख रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने भी दोनों देशों से संयम बरतने की अपील की है। United Nations के कई अधिकारियों ने कहा है कि किसी भी बड़े युद्ध से वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। खासकर तेल बाजार पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि मध्य-पूर्व दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है।

अगर यह तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सप्लाई और वैश्विक सुरक्षा सभी इस संघर्ष से प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि कई देश कूटनीतिक समाधान की मांग कर रहे हैं और अमेरिका तथा ईरान दोनों से बातचीत के जरिए समस्या हल करने की अपील कर रहे हैं।

आने वाले दिनों में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होता है या फिर यह टकराव और बड़ा रूप लेता है। फिलहाल दुनिया की नजरें इसी पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश युद्ध के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे या कूटनीति के जरिए इस संकट को टालने की कोशिश करेंगे।

 

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