
बिहार में मोदी को विपक्ष की कड़ी टक्कर।
Bihar Elections News: ये बात अब सिर्फ विपक्ष का नारा नहीं रह गई, बल्कि आम लोगों के बीच एक गहरी चर्चा का विषय बन चुकी है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे,

तो पूरे देश की तरह बिहार की जनता ने भी उम्मीदों के साथ उन्हें सत्ता में पहुंचाया था। वादे बड़े थे – विकास, रोजगार, उद्योग, भ्रष्टाचार खत्म करने और गरीबों को ऊपर उठाने की बात की गई थी। लेकिन आज, 2025 में, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो बिहार में ये सारे वादे अधूरे नजर आते हैं। और यही वजह है कि अब कहा जा रहा है कि “बिहार में मोदी फेल हो गए हैं।”
बिहार एक ऐसा राज्य है जहां शिक्षा और मेहनती युवाओं की कोई कमी नहीं है, लेकिन रोजगार के नाम पर केंद्र सरकार ने जो किया, वह नाकाफी रहा। आज भी लाखों युवा नौकरी की तलाश में अपना घर छोड़कर बाहर के राज्यों में पलायन कर रहे हैं। IT, इंडस्ट्री, मैन्युफैक्चरिंग जैसी योजनाएं सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गईं। केंद्र सरकार ने कई बार स्मार्ट सिटी, स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया जैसी योजनाओं का एलान किया, लेकिन इन योजनाओं का असर बिहार के छोटे शहरों या गांवों में जमीन पर नहीं दिखा।
बेरोजगारी के साथ-साथ महंगाई भी एक बड़ा मुद्दा बन गई है। डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस और खाने-पीने की चीजों की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। मोदी सरकार इन मुद्दों पर ठोस जवाब नहीं दे पा रही है। जब जनता सवाल करती है, तो जवाब में पुरानी सरकारों की याद दिला दी जाती है। लेकिन अब जनता 10 साल से सत्ता में बैठी सरकार से परिणाम देखना चाहती है, बहाने नहीं।
इसके अलावा कानून व्यवस्था भी एक बड़ी चिंता है। बिहार में अपराध तेजी से बढ़ा है। हत्या, अपहरण, लूट जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। व्यापारी वर्ग खास तौर से डरा हुआ है। अभी हाल में कई बड़े व्यापारियों की दिनदहाड़े हत्या ने पूरे प्रदेश को हिला दिया। विपक्ष इसे “जंगलराज की वापसी” कहता है, और जनता को भी यही महसूस हो रहा है कि कानून नाम की चीज अब सिर्फ कागज़ों में बची है।
जातीय जनगणना का मुद्दा भी मोदी सरकार के खिलाफ गया। नीतीश कुमार ने जब बिहार में जातीय गणना कराई और उसका रिपोर्ट जारी किया, तो मोदी सरकार ने चुप्पी साध ली। बीजेपी शुरू से इस मुद्दे पर असहज रही, और इसका सीधा फायदा विपक्ष ने उठाया। उन्होंने पूछा कि अगर पिछड़ी जातियों और गरीब तबकों के लिए योजनाएं बनानी हैं, तो उनकी सही संख्या और हालात जानना जरूरी क्यों नहीं है? इस मुद्दे ने भाजपा को बिहार में बैकफुट पर ला दिया।
तेजस्वी यादव और महागठबंधन ने इन सभी मुद्दों को एकजुट कर केंद्र सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार को सिर्फ भाषणों में याद किया, लेकिन ज़मीनी बदलाव के लिए कुछ खास नहीं किया। युवा, किसान, व्यापारी और मजदूर – हर वर्ग आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने चुनावी रैलियों में बिहार को “डबल इंजन सरकार” का लाभ दिलाने का दावा किया था। कहा गया था कि जब राज्य और केंद्र दोनों में एक जैसी सरकार होगी, तो विकास की रफ्तार दोगुनी हो जाएगी। लेकिन असल में लोग पूछ रहे हैं कि यह डबल इंजन क्यों पटरी से उतर गया? बेरोजगारी और अपराध में इज़ाफा, और विकास की कमी से लोगों का भरोसा अब डगमगाने लगा है।
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि भाजपा ने बिहार को सिर्फ चुनावी आंकड़ों का हिस्सा समझा, और वहां कभी भी गंभीरता से स्थायी विकास की रणनीति नहीं बनाई। हर चुनाव से पहले बड़े वादे करना और बाद में भूल जाना – यही पैटर्न लोगों को अब खटकने लगा है।
जनता अब बदलाव चाहती है – ऐसा बदलाव जो सिर्फ चेहरे का नहीं, सोच और नीतियों का हो। सिर्फ भाषणों और इवेंट्स से भरोसा नहीं बनता, ज़मीन पर काम दिखाना होता है। और फिलहाल, बिहार में मोदी सरकार की यही सबसे बड़ी नाकामी है – कि इतने सालों बाद भी लोग वही सवाल पूछ रहे हैं, जिनके जवाब 2014 में मिलने की उम्मीद थी।
अगर यही हालात बने रहे, तो आने वाले चुनाव में बिहार से भाजपा और मोदी को बड़ा झटका लग सकता है। क्योंकि अब जनता सिर्फ सुनना नहीं चाहती, वो देखना और महसूस करना चाहती है – और फिलहाल उसे कुछ खास नजर नहीं आ रहा।
