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अब 50% टैरिफ :  डोनाल्ड ट्रंप

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 अब 50% टैरिफ :  डोनाल्ड ट्रंप

ट्रंप ने भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया, कुल टैरिफ 50% तक पहुंचा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आज रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर “दंड” के रूप में 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की, जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत हो गया।

 

टैरिफ (Tariff):

टैरिफ (Tariff) एक प्रकार का कर (tax) होता है जो किसी देश की सरकार द्वारा0  विदेश से आयात किए गए सामानों पर लगाया जाता है।इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना, सरकार के लिए राजस्व जुटाना और व्यापार नीतियों को नियंत्रित करना होता है। जब किसी उत्पाद पर टैरिफ लगाया जाता है, तो उसकी कीमत बढ़ जाती है, जिससे वह विदेशी सामान देश के अंदर महंगा पड़ता है

और लोग घरेलू उत्पादों को प्राथमिकता देने लगते हैं। टैरिफ दो तरह के होते हैं: सामान्य टैरिफ और प्रतिशोधात्मक टैरिफ जिसमें दूसरा तब लगाया जाता है जब कोई देश व्यापारिक या राजनीतिक कारणों से जवाबी कार्रवाई करना चाहता है।

टैरिफ के फायदे और नुकसान (आसान हिंदी में):

 

फायदे:

टैरिफ यानी सीमा शुल्क लगाने से देश के घरेलू सामान और कंपनियों को विदेशी सामान से बचाव मिलता है। इससे देश में उद्योग बढ़ते हैं, नौकरियां बनती हैं और सरकार को अधिक टैक्स मिलता है जिसे विकास के कामों में लगाया जा सकता है। कभी-कभी सरकार इसका इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव डालने के लिए भी करती है।

 

नुकसान:

लेकिन टैरिफ से विदेशी सामान महंगा हो जाता है जिससे आम लोगों को ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इससे महंगाई बढ़ सकती है। अगर हम किसी देश पर टैरिफ लगाते हैं, तो वो भी हमारे सामान पर टैक्स लगा सकता है, जिससे निर्यात यानी एक्सपोर्ट कम हो जाता है। इसके अलावा, घरेलू कंपनियां आलसी हो सकती हैं क्योंकि उन्हें मुकाबला नहीं करना पड़ता।

 

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 50% टैरिफ यानी सीमा शुल्क लगा दिया है, और इस फैसले ने भारत के उद्योग जगत, सरकार और आम नागरिकों के बीच चिंता की लहर दौड़ा दी है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने यह फैसला भारत द्वारा रूस से तेल की भारी मात्रा में खरीद करने के चलते लिया है। ट्रम्प का आरोप है कि भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर अमेरिकी प्रतिबंधों को कमजोर कर रहा है, जिससे अमेरिकी उद्योगों को नुकसान हो रहा है। इसलिए, उन्होंने भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर अब अतिरिक्त 25% शुल्क लगा दिया है, जिससे कुल टैरिफ दर 50% हो गई है।

यह आदेश 6 अगस्त को जारी किया गया है और इसे 27 अगस्त से लागू किया जाएगा। इसका मतलब है कि अगले 21 दिनों में भारत से अमेरिका को भेजे जाने वाले कई प्रमुख उत्पादों पर अब 50% तक कर लगेगा, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धा बहुत घट जाएगी। प्रभावित होने वाले प्रमुख सेक्टरों में कपड़ा, गहने, रसायन, चमड़ा, कृषि उत्पाद, और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

 

अब सवाल ये है कि भारत सरकार ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी है?

विदेश मंत्रालय की ओर से इस कदम को “अनुचित”, “अन्यायपूर्ण” और “तार्किक रूप से अस्वीकार्य” बताया गया है। भारत ने साफ कहा है कि रूस से तेल खरीद उसकी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित से जुड़ा मामला है, और ये किसी तीसरे देश को तय करने का अधिकार नहीं है। सरकार का यह भी कहना है कि वह अमेरिका से व्यापार वार्ता जारी रखेगी, लेकिन अगर भारत के हितों को नुकसान हुआ तो जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

लेकिन इस पूरे मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से अब तक कोई सीधी टिप्पणी नहीं आई है। यही चुप्पी अब राजनीतिक सवालों में बदल रही है। विपक्ष खासकर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी लगातार सरकार से जवाब मांग रहे हैं। राहुल गांधी ने इसे “आर्थिक ब्लैकमेल” बताया है और पीएम मोदी से पूछा है कि “क्या राष्ट्रहित की बात करना अब सिर्फ चुनावी नारों तक सीमित रह गया है?”

शशि थरूर ने भी ट्रम्प के फैसले की आलोचना करते हुए कहा है कि यह भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला है और अमेरिका का डबल स्टैंडर्ड उजागर करता है। उनका कहना है कि अमेरिका खुद तो अपने राष्ट्रीय हितों के लिए फैसले करता है, लेकिन जब भारत ऐसा करता है तो उसे सज़ा देता है।

अब बात करें अर्थव्यवस्था की तो इस फैसले का असर भारत के GDP यानी सकल घरेलू उत्पाद पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर यह टैरिफ लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारत की GDP वृद्धि दर पर 40 से 50 आधार अंकों यानी 0.4% से 0.5% तक असर हो सकता है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा, जो पहले ही वैश्विक मंदी, मानसून की अनिश्चितता और आंतरिक मांग में कमी जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।

 

भारतीय निर्यातक भी इस फैसले से चिंतित हैं। खासकर टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी, फार्मा और समुद्री उत्पादों के व्यापारी कह रहे हैं कि अमेरिका उनका सबसे बड़ा बाजार है और 50% टैरिफ के साथ वे अपनी कीमतों में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। इसके चलते उन्हें ऑर्डर कम होने की आशंका है और नौकरियों पर भी असर पड़ सकता है।

 

अब सवाल यह है कि क्या भारत इस चुनौती को अवसर में बदल सकता है?

 

बिजनेस लीडर आनंद महिंद्रा ने इस पूरे घटनाक्रम को भारत के लिए एक “नया 1991” बताया है। उन्होंने कहा है कि जैसे 1991 में आर्थिक संकट भारत में सुधारों की नींव बना, वैसे ही यह संकट भी आत्मनिर्भर भारत को मजबूती देने का मौका हो सकता है। उन्होंने सरकार से दो बड़े कदम उठाने की बात कही है — पहला, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाओं को और तेज़ी से लागू किया जाए, और दूसरा, एक्सपोर्ट-फ्रेंडली लॉजिस्टिक्स और टैक्स सुधार किए जाएं।

 

सरकार ने भी इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। निर्यातकों को राहत देने के लिए कुछ प्रक्रियाओं को सरल किया गया है, और वित्त मंत्रालय जल्दी ही एक राहत पैकेज की घोषणा कर सकता है। इसके अलावा, सरकार आत्मनिर्भर भारत और ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियानों के जरिए लोगों से घरेलू उत्पादों को अपनाने की अपील कर रही है।

 

लेकिन एक अहम बात यह भी है कि सिर्फ आत्मनिर्भरता की बातें करना काफी नहीं होगा। भारत को विश्व व्यापार संगठनों और बहुपक्षीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाना होगा, ताकि एक न्यायसंगत वैश्विक व्यापार प्रणाली कायम रह सके।

 

इस सबके बीच आम जनता भी सवाल कर रही है कि क्या यह सब पहले से नहीं रोका जा सकता था? क्या भारत ने अपनी विदेश नीति में अमेरिका और रूस के बीच संतुलन नहीं साधा? क्या कूटनीति विफल रही? और सबसे बड़ा सवाल — क्या भारत की चुप्पी अब भारी पड़ने लगी है?

यहाँ कुछ और छोटे और प्रभावशाली थंबनेल लाइन के सुझाव हैं:

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