
पाक-ईरान नजदीकी बढ़ी, भारत चिंतित।
Pakistan Iran Relations:हाल ही में पाकिस्तान और ईरान के रिश्तों में एक नया मोड़ देखने को मिला है। जहां पहले दोनों देशों के संबंध सीमा पर तनाव, सुरक्षा संकट और सामरिक अविश्वास से भरे रहते थे, वहीं अब उनके बीच रिश्तों में गर्मजोशी दिखाई देने लगी है। यह बदलाव सिर्फ कूटनीतिक मुलाक़ातों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामरिक सहयोग, ऊर्जा परियोजनाएं और क्षेत्रीय रणनीति जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं। इस नए समीकरण को भारत की नज़र से देखा जाए तो सवाल उठता है – क्या यह बदलाव भारत के लिए चिंता का कारण बन सकता है?

पाकिस्तान और ईरान की भौगोलिक सीमाएं आपस में मिलती हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इनके बीच भरोसे की कमी रही है। खासकर बलूचिस्तान के मुद्दे को लेकर दोनों देशों में गहरे मतभेद थे। ईरान का बलूच बहुल इलाका ‘सीस्तान-बलूचिस्तान’ आतंकवाद और अलगाववाद से प्रभावित रहा है, और पाकिस्तान के बलूचिस्तान में भी कई गुट सक्रिय हैं। दोनों देश अक्सर एक-दूसरे पर आतंकवादियों को शरण देने का आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन इस वर्ष जनवरी में जब दोनों देशों के बीच मिसाइल हमले और जवाबी कार्रवाई जैसी घटनाएँ हुईं, उसके बाद कुछ ही हफ्तों में दोनों ने आपसी मतभेदों को बातचीत से सुलझाने की दिशा में कदम बढ़ाए।
मई 2025 में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की पाकिस्तान यात्रा को एक अहम मोड़ माना गया। इस दौरे में दोनों देशों ने न केवल सीमा सुरक्षा पर समझौते किए, बल्कि गैस पाइपलाइन परियोजनाओं, व्यापारिक मार्गों और संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने की बात कही। खास बात यह रही कि ईरान ने पाकिस्तान के साथ ऊर्जा के क्षेत्र में ऐसे समझौते किए जो पहले भारत के लिए रणनीतिक साझेदारी के संकेत माने जाते थे।
चाबहार बंदरगाह का मुद्दा भी इसमें एक खास भूमिका निभाता है। भारत ने चाबहार पोर्ट को विकसित किया है ताकि वह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक बिना पाकिस्तान के रास्ते के व्यापार कर सके। यह बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर है और भारत-ईरान के बीच रणनीतिक सहयोग का प्रतीक रहा है। लेकिन हाल के घटनाक्रमों में जब ईरान ने चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकियों के संकेत दिए, तो भारत को यह चिंता सताने लगी कि कहीं चाबहार से उसका प्रभाव कम न हो जाए। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
दूसरी ओर पाकिस्तान के लिए यह साझेदारी बेहद अहम है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पहले ही पाकिस्तान की विदेश नीति का बड़ा स्तंभ बन चुका है। अब अगर ईरान इस गलियारे से जुड़ता है या उससे समानांतर कोई ऊर्जा सहयोग बनता है, तो यह क्षेत्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। चीन भी चाहता है कि ईरान जैसे देश उसकी बेल्ट एंड रोड परियोजना में अधिक सक्रिय भूमिका निभाएं। ऐसे में पाकिस्तान और ईरान की यह बढ़ती निकटता केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं बल्कि एक बड़े क्षेत्रीय गठबंधन का हिस्सा बनती दिख रही है।
भारत के लिए यह स्थिति कई स्तरों पर जटिल है। सबसे पहले तो भारत-ईरान संबंधों पर इसका असर पड़ सकता है। अगर ईरान पाकिस्तान के करीब जाता है, तो चाबहार में भारत की भूमिका सीमित हो सकती है। दूसरा, क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है, खासकर अफगानिस्तान में जहां भारत मानवीय और विकास सहायता के ज़रिए अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। तीसरा, पाकिस्तान और ईरान के बीच सुरक्षा सहयोग अगर गहराता है, तो भारत की पश्चिमी सीमा पर नई चुनौतियाँ उभर सकती हैं।
भारत ने इन हालातों को देखते हुए कूटनीतिक रूप से सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है। हाल ही में विदेश मंत्री की ईरान यात्रा और ऊर्जा समझौतों को फिर से गति देने की कोशिशें इसी दिशा में हैं। भारत यह संदेश देना चाहता है कि ईरान के लिए वह एक स्थिर, विश्वसनीय और दीर्घकालिक साझेदार है। लेकिन भारत को यह भी समझना होगा कि ईरान अब एक बहुध्रुवीय रणनीति अपना रहा है — वह चीन, रूस, पाकिस्तान, भारत सभी के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखना चाहता है।
इन सभी घटनाओं को देखकर यह साफ है कि भारत को न केवल पश्चिमी एशिया में अपनी नीति को मजबूत और सक्रिय बनाना होगा, बल्कि अपनी कूटनीतिक उपस्थिति को भी नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा। पाकिस्तान और ईरान की बढ़ती निकटता भारत के लिए एक चेतावनी है, लेकिन अगर इसे अवसर में बदला जाए तो भारत अपनी ऊर्जा कूटनीति और क्षेत्रीय रणनीति को और सशक्त बना सकता है।