
सऊदी UAE का मदद से इनकार? इजरायल अकेला?
IRAN-US WAR: मिडिल ईस्ट में जारी जंग अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां इजरायल की स्थिति को लेकर बड़े सवाल उठने लगे हैं। खबरें सामने आ रही हैं कि लगातार युद्ध के बीच इजरायल पर दबाव बढ़ रहा है—और अब चर्चा ये भी है कि क्या उसके हथियार धीरे-धीरे कम पड़ने लगे हैं? और क्या सऊदी अरब और UAE जैसे बड़े देश खुलकर मदद करने से पीछे हट रहे हैं?
सबसे पहले बात करते हैं जमीनी हालात की। पिछले कई हफ्तों से इजरायल और अमेरिका लगातार ईरान पर हमले कर रहे हैं। एयरस्ट्राइक, मिसाइल अटैक और सैन्य ऑपरेशन लगातार जारी हैं। लेकिन इसके जवाब में ईरान भी चुप नहीं बैठा है। उसने पूरे मिडिल ईस्ट में मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं, जिनमें इजरायल के साथ-साथ खाड़ी देशों तक को निशाना बनाया गया है।

युद्ध जितना लंबा खिंच रहा है, उतना ही संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इजरायल को लगातार अपने एयर डिफेंस सिस्टम, मिसाइल इंटरसेप्टर और सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उसके हथियारों का स्टॉक तेजी से कम हो रहा है? हालांकि आधिकारिक तौर पर इजरायल ने ऐसी कोई पुष्टि नहीं की है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में किसी भी देश पर संसाधनों का दबाव बढ़ना तय है।

अब बात करते हैं सऊदी अरब और UAE की। बहुत से लोग मान रहे हैं कि ये देश खुलकर इजरायल या अमेरिका का साथ देंगे, लेकिन हकीकत थोड़ी अलग है। रिपोर्ट्स के मुताबिक खाड़ी देशों का रुख काफी सावधानी भरा है। वे इस युद्ध में सीधे कूदने से बच रहे हैं और चाहते हैं कि हालात जल्दी शांत हों।

दरअसल, इन देशों के सामने सबसे बड़ी चिंता अपनी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था है। ईरान पहले ही UAE और आसपास के इलाकों पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर चुका है, जिससे साफ हो गया है कि अगर ये देश सीधे युद्ध में उतरते हैं, तो उन्हें भी भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। ()
कुछ रिपोर्ट्स ये भी बताती हैं कि कई देश खुलकर सैन्य मदद देने के बजाय कूटनीतिक रास्ते पर जोर दे रहे हैं। यहां तक कि यूरोप के कुछ देशों ने भी सीधे सहयोग से दूरी बनाई है, जिससे अमेरिका और इजरायल पर दबाव बढ़ता दिख रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या इजरायल सच में अकेला पड़ रहा है? इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। इजरायल अभी भी अमेरिका के साथ खड़ा है और दोनों मिलकर बड़े स्तर पर ऑपरेशन चला रहे हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह एकजुट समर्थन नहीं मिल रहा, जिससे रणनीतिक चुनौतियां जरूर बढ़ रही हैं।

वहीं दूसरी तरफ ईरान की ताकत को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। लगातार हमलों के बावजूद उसके पास अभी भी बड़ी मिसाइल क्षमता बची हुई है और वह जवाबी कार्रवाई कर रहा है।
तो दोस्तों, कुल मिलाकर स्थिति बेहद जटिल और गंभीर है। एक तरफ इजरायल और अमेरिका की सैन्य ताकत है, तो दूसरी तरफ ईरान का लगातार जवाब। खाड़ी देशों का सावधान रुख इस युद्ध को और ज्यादा पेचीदा बना रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि क्या यह संघर्ष और बड़ा रूप लेता है या फिर दुनिया के बड़े देश मिलकर इसे रोकने में सफल होते हैं।