
शिया विरासत अफ़्रीका में
African News:बरसों पहले, जब अफ्रीका की धरती पर एक ख़ामोश बगावत पल रही थी, तब युगांडा की गलियों में एक लड़का बड़ा हो रहा था — महमूद ममदानी। उसकी नसों में कराची की गलियों की मिट्टी थी, जो उसके दादा अपने साथ ईस्ट अफ्रीका ले आए थे। वो गुजराती शिया मुस्लिम थे, जो मज़हबी जुलूसों और मातमी परंपराओं के बीच बड़े हुए थे, मगर उनके दिल में सवाल थे — और सवाल करना उनके लिए सिर्फ़ इल्म की तलब नहीं, इबादत थी।

महमूद ने देखा कि किस तरह उपनिवेशवाद ने अफ्रीका को लूटा, कैसे लोग अपनी ज़मीन पर भी पराये बना दिए गए। उन्होंने इन सवालों को अपनी किताबों में उकेरा, अपने लेक्चरों में ज़िंदा रखा और दुनिया को बताया कि अगर तुम
इतिहास को सिर्फ़ यूरोप की आँखों से देखोगे, तो सच कभी नज़र नहीं आएगा। उनका इल्म किसी एक मुल्क की जागीर नहीं था — वो अफ्रीका, एशिया, इस्लाम और इंसानियत, इन सबकी साझी आवाज़ थे।

फिर वक़्त ने करवट ली। उनके घर में एक बच्चा आया — जोहरान ममदानी। उसकी परवरिश उस घर में हुई जहाँ दीवारों पर इकबाल की शायरी थी, और शामों में माँ — मीनाक्षी मुखर्जी — टैगोर की कविताएँ सुनाया करती थीं।
एक बंगाली हिंदू और एक गुजराती शिया मुस्लिम के बेटे होने का मतलब ये था कि जोहरान के लिए मज़हब कोई सीमा नहीं, बल्कि सेतु था।
बचपन में जोहरान ने मुहर्रम के मातम देखे, जहाँ हर कोई हुसैन (अ.स) को याद करके रोता था — मगर ये आंसू कोई मजबूरी नहीं, एक इंकलाब की मिसाल थे। उन्होंने सीखा कि कर्बला सिर्फ़ एक तारीख नहीं, एक तहरीक है — ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने की तालीम।
जब जोहरान बड़े हुए, तो उन्हें ये महसूस हुआ कि वो अमरीका जैसे मुल्क में एक ऐसे तबके से हैं जिसकी आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है। ब्रुकलिन और क्वीन्स की गलियों में पलने वाले किरायेदार, प्रवासी, ब्लैक और ब्राउन नौजवान — जिनकी ज़िंदगी की तकलीफें न्यू यॉर्क की चकाचौंध में खो जाती थीं — वही जोहरान की आवाज़ बन गए।
उन्होंने राजनीति को सिर्फ़ एक ओहदा नहीं, एक ज़िम्मेदारी समझा। जब वह न्यू यॉर्क स्टेट असेंबली में पहुंचे, तो उन्होंने किसी परंपरागत नेता की तरह भाषण नहीं दिया — उन्होंने कहा, “हम वहाँ नहीं हैं जहाँ हमारी जड़ें हैं, मगर हमारी लड़ाई वहीं से शुरू होती है।”
उन्होंने पुलिस सुधारों पर काम किया, हाउसिंग अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी, और खास बात ये रही कि उन्होंने अपनी तहज़ीब को कभी पीछे नहीं छोड़ा। उनकी जुबान में उर्दू के लफ़्ज़, उनकी बातों में हुसैनी रवैया, और उनके फ़ैसलों में इंसाफ़ का वज़न होता था।
जब वो अपने इलाके़ के लोगों से मिलते, तो कोई पूछता — “तुम कहां से हो?”
जोहरान ठहर कर मुस्कराते और कहते,
“मैं कराची से भी हूँ, युगांडा से भी, और यहीं क्वीन्स की गली का बेटा भी हूँ। मेरे अंदर हुसैन की कहानी है और मुझमें माँ की कविताओं की रूह है।”
उनके विरोधी उन्हें “वामपंथी”, “विदेशी”, “अलग सोच वाला” कहकर चुप कराने की कोशिश करते, मगर उन्होंने वही किया जो कर्बला में अली अकबर ने किया था — सर ऊँचा रखा और हक़ की राह पर डटे रहे।
आज जोहरान ममदानी न्यू यॉर्क की सियासत में सिर्फ़ एक नाम नहीं हैं — वो एक मिसाल हैं। वो उस उम्मीद का नाम हैं जो हर शिया नौजवान अपने सीने में पालता है, कि उसकी पहचान उसे सीमित नहीं करती, बल्कि मजबूत बनाती है।
उन्होंने ये साबित किया कि शिया मुसलमान होना, प्रवासी होना, या अल्पसंख्यक होना — कोई बोझ नहीं, बल्कि एक नैतिक ज़िम्मेदारी है: ज़ालिम के खिलाफ खड़ा होना, मज़लूम के साथ चलना।
और शायद यही वजह है कि जोहरान को सुनते वक़्त लोगों को उनकी आवाज़ में सिर्फ़ एक पॉलिटिशियन नहीं, बल्कि एक “ज़ाकिर” की सी गूंज सुनाई देती है — जो इंसाफ़ की मिम्बर पर खड़ा होकर हुसैनी पैगाम सुनाता है।