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जश्न-ए-मिलाद-उन-नबी पर समाज सेवी ने लगाई सबील।

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जश्न-ए-मिलाद-उन-नबी पर समाज सेवी ने लगाई सबील।

लखनऊ। ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के मौके पर अमीनाबाद के कच्चा हाता में पैगंबर-ए-अकरम हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.) की विलादत का जश्न बेहद अकीदत और जोश-ओ-खरोश से मनाया।

 

अमीनाबाद के (मोहल्ला) कच्चा हाता में नबी की पैदाइश के मौके पर शान हुसैन समाज सेवी ने सबील का इंतज़ाम किया।

इस पुर-असरार रात में, अकीदतमंदों का एक जुलूस नबी की शान में नात-ओ-मनकबत पढ़ते हुए गलियों से गुज़रा।

हर हाथ में नबी का परचम था, जो उनकी अज़ीम शख्सियत और पैगाम की निशानी थी। लोगों ने झंडों को कियारत किया, और यह मंज़र रूहानी कैफियत से भरपूर था।

यह सबील सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि पैगंबर मोहम्मद रसूल-ए-पाक (स.अ.व.) की पाक सीरत और उनकी अमानत का एक आइना थी। इस सबील पर रात भर राहगीरों और जुलूस में शामिल लोगों के लिए चाय, बिस्किट और पानी का बंदोबस्त किया गया, ताकि लंबी दूरी तय करने वाले लोगों को आराम मिले और उनकी तकलीफें आसान हों।

इस नेक काम की ज़िम्मेदारी शान हुसैन समाजसेवी के कंधों पर थी। उनके साथ क्षेत्र के और भी अज़ीम शख्सियतें मौजूद थीं, जिन्होंने मिलकर इस सबील को कामयाब बनाया। उन सभी मोमिनों के ताऊन से ही यह इंतज़ाम किया गाया।

पैगंबर (स.अ.व.) ने हमेशा ही इंसानियत, मुहब्बत और भाईचारे का पैगाम दिया। उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी तालीम थी जरूरतमंदों की मदद करना और लोगों में खुशियां बांटना।

यह सबील उन्हीं उसूलो पर अमल करने का एक अज़ीम मौका था। इस पाक मौके पर हर चेहरे पर एक खास रौनक और तसल्ली थी, जो इस बात का सबूत थी कि नबी की अमानत, उनकी सुन्नते और तालीम, आज भी हमारे दिलों में जिंदा हैं।

यह जश्न सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि पैगंबर की दिखाई हुई राह पर चलने और उनकी अमानत-ए-जिंदगी को कायम रखने का एक अहद था।

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