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बिहार चुनाव 2025 का सबसे बड़ा सर्वे – पलड़ा किसका भारी?

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बिहार चुनाव 2025 का सबसे बड़ा सर्वे – पलड़ा किसका भारी?

बिहार चुनाव 2025: बिहार की राजनीति एक बार फिर गर्म है। सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा है — *“इस बार कौन जीतेगा?”* 243 विधानसभा सीटों वाले बिहार में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प है। जहां एक तरफ *राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA)* यानी बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी (रामविलास) जैसी पार्टियाँ हैं, वहीं दूसरी ओर *महागठबंधन (RJD, कांग्रेस, वाम दल)* पूरी ताकत से मैदान में है। इसके अलावा *प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी* और कुछ स्थानीय छोटे दल भी मैदान में हैं, जिन्होंने इस चुनाव को और भी बहु-कोणीय बना दिया है।

NDA का पलड़ा भारी, लेकिन चुनौतियाँ भी बड़ी

हालिया सर्वे और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस समय बिहार में NDA थोड़ा आगे दिखाई दे रहा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि *NDA को लगभग 48-50% वोट शेयर* मिल सकता है, जबकि *महागठबंधन को करीब 37-39% वोट* मिलने का अनुमान है। अगर यही स्थिति बनी रहती है, तो NDA को *130 से 150 सीटें* तक मिल सकती हैं, जबकि महागठबंधन को *80 से 95 सीटों* तक सीमित रहना पड़ सकता है।
नीतीश कुमार, जो एक बार फिर NDA के मुख्यमंत्री उम्मीदवार हैं, उनके पक्ष में करीब *45-46% मतदाता* झुकाव दिखा रहे हैं। वहीं, तेजस्वी यादव के पक्ष में लगभग *15-18% मतदाता* समर्थन दे रहे हैं। बीजेपी के चेहरे नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब भी राज्य में मजबूत बनी हुई है, खासकर शहरी इलाकों और पहली बार वोट डालने वाले युवाओं के बीच।

किन सीटों पर सबसे कड़ा मुकाबला

कई सीटें इस बार हॉटस्पॉट बन चुकी हैं। जैसे—

* *दरभंगा की बहादुरपुर सीट* पर जेडीयू के मदन साहनी और आरजेडी के भोला यादव के बीच सीधी टक्कर है। यहां मतदाता जातीय समीकरण से ज़्यादा विकास को मुद्दा मान रहे हैं।
* *पटना साहिब, **मुजफ्फरपुर, **गया, **भागलपुर, और **सीवान* जैसी सीटों पर भी घमासान है।
* *चिराग पासवान* की एलजेपी (रामविलास) भी कई सीटों पर NDA के अंदर “फ्रेंडली फाइट” लड़ रही है, जो नतीजों में दिलचस्प मोड़ ला सकती है।
पहले चरण में *64.7% वोटिंग* हुई, जो बिहार के इतिहास में अब तक की सबसे ज्यादा मतदान दर है। यह बताता है कि जनता इस बार बदलाव के मूड में है और ज्यादा से ज्यादा लोग लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं।

जनता का मूड – रोज़गार और विकास मुख्य मुद्दे**

बिहार के मतदाताओं का मूड इस बार पूरी तरह *विकास, रोज़गार और महंगाई* पर केंद्रित है। युवाओं में नाराज़गी साफ़ झलक रही है क्योंकि उन्हें लगता है कि अब तक वादे पूरे नहीं हुए। कई युवाओं ने इंटरव्यू में कहा,

“हमने बार-बार नौकरी और रोजगार की बात सुनी, लेकिन हकीकत में कुछ बदला नहीं।”

गांवों में अब भी *सड़क, बिजली और शिक्षा* बड़ी समस्या हैं, जबकि शहरों में लोग *महंगाई और कानून-व्यवस्था* से परेशान हैं। वहीं, महागठबंधन इन मुद्दों पर सरकार को घेरने में जुटा है। तेजस्वी यादव लगातार बेरोज़गारी पर हमले बोल रहे हैं और यह दावा कर रहे हैं कि अगर उनकी सरकार बनी तो राज्य में “10 लाख सरकारी नौकरियाँ” दी जाएंगी। दूसरी तरफ, नीतीश कुमार अपने 20 साल के विकास मॉडल का हवाला देकर कह रहे हैं कि “जो काम किया है, वही बोलता है।”
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी – नया चेहरा, नई बात**

इस बार का चुनाव थोड़ा अलग इसलिए भी है क्योंकि *प्रशांत किशोर (PK)* पहली बार अपनी पार्टी *जन सुराज* के साथ मैदान में हैं। उनका कहना है कि बिहार की राजनीति “जाति नहीं, काम और विकास” पर होनी चाहिए। उन्होंने पूरे राज्य में पदयात्रा करके सीधे जनता से जुड़ने की कोशिश की है। सर्वे बताते हैं कि जन सुराज पार्टी को अभी *3-5% वोट शेयर* मिल सकता है, जो भले ही सरकार बनाने के लिए काफी न हो, लेकिन यह महागठबंधन के वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है।
महागठबंधन का संघर्ष**

तेजस्वी यादव ने इस चुनाव को “जनता बनाम सत्ता” की लड़ाई कहा है। कांग्रेस, आरजेडी और वाम दलों के साथ मिलकर वे युवाओं, किसानों और गरीबों को साधने की कोशिश कर रहे हैं। उनका फोकस है— “रोजगार, शिक्षा और भ्रष्टाचार खत्म करना।”
लेकिन महागठबंधन की चुनौती यह है कि उन्हें अपने पुराने वोट बैंक को एकजुट रखना है, साथ ही युवाओं में भरोसा पैदा करना है। 2020 के चुनाव में भी तेजस्वी यादव ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया था, पर इस बार अगर वे सीटें बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें अपने संगठन को मजबूत करना होगा।

जमीन पर क्या कह रही है जनता**

जब हम बिहार के अलग-अलग जिलों में लोगों की राय देखते हैं तो तस्वीर मिश्रित दिखती है।

* *गया* और *नवादा* में लोग कहते हैं कि सरकार ने “सड़कें और बिजली” दी हैं, इसलिए वे फिर से NDA को मौका देना चाहते हैं।
* *सीवान, छपरा और समस्तीपुर* में लोगों का कहना है कि “हमने बहुत वादे सुने, अब काम दिखना चाहिए।”
* *पटना और दरभंगा* जैसे शहरों में युवा वोटर ज्यादा निर्णायक भूमिका में हैं। कई युवा कहते हैं,

> “हम अब जाति देखकर नहीं, काम देखकर वोट देंगे।”

वोटर लिस्ट और SIR प्रक्रिया पर विवाद**

इस बार चुनाव से पहले मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर *SIR (Summary Investigation Report)* प्रक्रिया चली, जिसमें कई नाम हटाए गए या बदले गए। इससे कुछ मतदाताओं में नाराज़गी भी है कि “हमारा नाम बिना सूचना के काट दिया गया।” चुनाव आयोग ने कहा है कि यह प्रक्रिया फर्जी या डुप्लीकेट नामों को हटाने के लिए की गई है, न कि किसी का वोट काटने के लिए। लेकिन इस मुद्दे ने राजनीतिक रूप से माहौल को थोड़ा गरम बना दिया है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार की जनता इस बार *चुपचाप लेकिन सोच-समझकर वोट डाल रही है।*
NDA फिलहाल आगे दिख रही है, लेकिन तेजस्वी यादव और महागठबंधन के लिए यह आख़िरी राउंड का खेल अभी बाकी है। चुनाव आयोग के आँकड़े बताते हैं कि महिला वोटरों की भागीदारी इस बार ऐतिहासिक रूप से ज्यादा रही है, जो किसी भी पार्टी के पक्ष में बड़ा फैक्टर बन सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मतदान प्रतिशत ऐसे ही ऊँचा रहा, तो *कई सीटों पर अप्रत्याशित नतीजे* देखने को मिल सकते हैं।

अंत में इतना कहा जा सकता है कि बिहार की जनता अब “वादों” से ज़्यादा “काम” चाहती है। इस बार का चुनाव न सिर्फ नेताओं की परीक्षा है, बल्कि मतदाताओं की परिपक्वता का भी उदाहरण है। कौन जीतेगा, यह तो नतीजे बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि *बिहार की राजनीतिक कहानी एक नए अध्याय की ओर बढ़ रही है।*

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