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अयोध्या में मस्जिद रुकी, बंगाल में नोटों की बारिश!

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अयोध्या में मस्जिद रुकी, बंगाल में नोटों की बारिश!

BABRI MASJID CASE:अयोध्या में बाबरी मस्जिद की कहानी आज भी लोगों की सोच और राजनीति में गहराई तक छाई हुई है। 1992 में जब बाबरी मस्जिद को गिराया गया था, तब देशभर में बड़ी सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बन गई थी। लंबे समय तक इस विवाद ने राजनीति, न्याय और समाज को प्रभावित किया। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस विवादित जमीन के लिए अंतिम फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वहां राम मंदिर का निर्माण होगा, और मुस्लिम पक्ष को अयोध्या के पास पाँच एकड़ वैकल्पिक जमीन दी जाएगी ताकि वहाँ नई मस्जिद बनाई जा सके। इस फैसले को सभी पक्षों ने मान्यता दी, लेकिन अब छह साल गुजर जाने के बाद भी उस वैकल्पिक जमीन पर मस्जिद का निर्माण शुरू नहीं हो पाया।

मुख्य कारणों में नक्शे और डिज़ाइन की मंजूरी में देरी, फंडिंग की समस्या और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलताएँ शामिल हैं। कई बार यह मुद्दा राजनीतिक सहमति और संगठनात्मक मतभेदों के कारण भी रुका। परिणाम यह हुआ कि आज भी उस जमीन पर कोई निर्माण नहीं हुआ है और वह जगह पूरी तरह खाली पड़ी हुई है। स्थानीय समुदाय और प्रशासन दोनों ही इस मुद्दे पर मिलकर काम करने के प्रयास कर रहे हैं, लेकिन विभिन्न स्तरों की बाधाओं के कारण आगे बढ़ना मुश्किल साबित हो रहा है।

इसी बीच पश्चिम बंगाल में स्थिति बिल्कुल अलग दिखाई दी। मुर्शिदाबाद जिले में एक निलंबित विधायक ने “बाबरी मस्जिद” के नाम पर शिलान्यास किया। उसने सिर्फ तीन दिनों में करीब तीन करोड़ रुपये का दान इकट्ठा कर लिया। चंदा नकद के साथ डिजिटल माध्यमों से भी जमा किया गया। इससे एक नई मस्जिद निर्माण की प्रक्रिया बहुत तेजी से शुरू हो गई। यह अंतर कई सवाल उठाता है। एक ओर असली बाबरी मस्जिद का मुद्दा अयोध्या में लंबित है और जमीन खाली पड़ी है, वहीं पश्चिम बंगाल में उसी नाम के आधार पर भारी चंदा और राजनीतिक सक्रियता देखी जा रही है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि “बाबरी” नाम अपने आप में लोगों की भावनाओं को जागृत करता है। इस नाम का इस्तेमाल धार्मिक आस्था को दिखाने के लिए हो सकता है, लेकिन राजनीतिक दृष्टिकोण से इसे चुनावी रणनीति के रूप में भी देखा जा सकता है। चुनाव से पहले इस तरह के आयोजन अक्सर वोटबैंक की भावनाओं को साधने के लिए किए जाते हैं। पश्चिम बंगाल में चंदा जुटाने की तेज़ी और कार्यक्रम की भव्यता से यह संकेत मिलता है कि यह केवल धार्मिक कारण नहीं था, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी इसमें शामिल था।

अयोध्या में मस्जिद न बनने की मुख्य वजहें प्रशासनिक मंजूरी, फंड की कमी, नक्शा पास न होना और संगठनात्मक मतभेद हैं। दूसरी ओर बंगाल में यही नाम बड़ी संख्या में लोगों को जोड़ने, दान करने और राजनीतिक ध्यान आकर्षित करने के लिए इस्तेमाल किया गया। इस तरह देखा जाए तो एक ही मुद्दा दो राज्यों में बिल्कुल अलग दिशा ले रहा है। अयोध्या में शांति और ठहराव है, जबकि बंगाल में गति, धन, चर्चा और राजनीतिक गतिविधियों का माहौल नजर आता है।

इस पूरी स्थिति में यह सवाल उठता है कि क्या धर्म ही मुख्य वजह है या राजनीति ने इसे अपनी चाल में बदल दिया है। इतिहास, भावनाएँ और राजनीति के मिश्रण ने इसे सिर्फ एक धार्मिक मुद्दा नहीं रहने दिया। यह दोनों राज्यों की परिस्थितियों, स्थानीय नेताओं की रणनीतियों और जनता की भावनाओं के मिलेजुले असर का नतीजा है। भविष्य में यह देखने वाली बात होगी कि अयोध्या में मस्जिद निर्माण कब शुरू होता है और पश्चिम बंगाल में शुरू की गई प्रक्रिया का क्या असर पड़ता है।

कुल मिलाकर, बाबरी मस्जिद का मुद्दा आज भी केवल एक धार्मिक विवाद नहीं है। यह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। अयोध्या और पश्चिम बंगाल की तुलना में स्पष्ट दिखता है कि किस तरह जमीन, प्रशासन, फंड और स्थानीय नेतृत्व मस्जिद निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। यह कहानी धर्म और राजनीति के बीच के जटिल रिश्ते को भी उजागर करती है और यह समझने में मदद करती है कि एक ही नाम और मुद्दे को अलग-अलग जगहों पर कितनी अलग तरह की प्रतिक्रियाएँ मिल सकती हैं।

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