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अयोध्या में बाबरी मस्जिद के बदले बनने वाली मस्जिद अब नहीं बनेगी!

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अयोध्या में बाबरी मस्जिद के बदले बनने वाली मस्जिद अब नहीं बनेगी!

Ayodhya News:अयोध्या विवाद का फैसला नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था, जिसमें राम जन्मभूमि विवाद को कानूनी रूप से हल करते हुए राम मंदिर के पक्ष में निर्णय दिया गया। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया।

यह ज़मीन अयोध्या के धनिपुर गाँव (Sohawal तहसील) में दी गई, जहां इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (IICF) नामक ट्रस्ट ने मस्जिद निर्माण की घोषणा की। इसे ‘धनिपुर मस्जिद’ या ‘नयी मस्जिद’ के नाम से जाना गया। मस्जिद के साथ अस्पताल, म्यूज़ियम, लाइब्रेरी और सामुदायिक किचन जैसी परियोजनाएं भी प्रस्तावित थीं।

लेकिन अब जब राम मंदिर का निर्माण अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है और जनवरी 2024 में उसका भव्य उद्घाटन हो चुका है, वहीं दूसरी तरफ यह सवाल उठने लगा है कि बाबरी के बदले बनने वाली मस्जिद का क्या हुआ? क्या वह बनेगी भी या नहीं? हाल ही में आई रिपोर्टों और अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) की कार्रवाई से ये आशंका और तेज़ हो गई है।

 

दरअसल, मस्जिद का जो नक्शा (Map/Layout Plan) ट्रस्ट द्वारा ADA को दिया गया था, उसे ऑटो-रिजेक्ट” कर दिया गया है। इसका कारण यह बताया गया कि ट्रस्ट ने जिन विभागों से No-Objection Certificates (NOCs) लेने थे — जैसे फायर विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, विद्युत विभाग आदि — वे दस्तावेज अधूरे थे या समय पर जमा नहीं किए गए। इस वजह से तकनीकी तौर पर प्राधिकरण ने योजना को नामंजूर कर दिया। ADA के अनुसार, यह “प्रक्रियात्मक रिजेक्शन” है, जिसका मतलब है कि यदि ट्रस्ट फिर से पूरी फाइल के साथ आवेदन करे तो उसे फिर से प्रक्रिया में लाया जा सकता है।

 

हालांकि इस रिजेक्शन के बाद सोशल मीडिया और कुछ चैनलों पर यह दावा ज़ोर पकड़ा कि “**अब वहां मस्जिद नहीं बनेगी**” और **”योगी सरकार ने कानूनी पेंच फंसा दिया है”**, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे थोड़ी अलग है। अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक आदेश या बयान नहीं आया है जो यह कहता हो कि मस्जिद का निर्माण अब नहीं होगा। लेकिन यह जरूर साफ हो गया है कि इसमें **प्रशासनिक जटिलताएं, दस्तावेज़ी कमियाँ और शायद राजनीतिक अनिच्छा** भी एक बड़ी भूमिका निभा रही है।

 

ट्रस्ट के एक सदस्य के अनुसार, उन्होंने अब नया डिज़ाइन तैयार करना शुरू कर दिया है, जो अब पूरी तरह **”अवधी स्थापत्य” (Awadhi architecture)** पर आधारित होगा — यानी पुराने लखनऊ और अवध क्षेत्र की पारंपरिक शैली में। पहले जो डिज़ाइन प्रस्तावित था वह आधुनिक और ग्लास-स्टील पर आधारित था, जिसकी आलोचना भी हुई थी कि यह स्थानीय भावनाओं और स्थापत्य परंपरा से मेल नहीं खाता। अब ट्रस्ट स्थानीय समाज को साथ लेकर काम करना चाहता है ताकि कोई विवाद न हो।

 

यहां एक और महत्वपूर्ण बात है — **स्थानीय प्रशासन और सरकार की चुप्पी**। जहां राम मंदिर के निर्माण को लेकर हर स्तर पर सरकारी सहायता और समर्पण देखा गया, वहीं मस्जिद निर्माण को लेकर सरकार पूरी तरह चुप है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि **योगी सरकार नहीं चाहती कि मस्जिद का निर्माण चुनावी माहौल में कोई नया विवाद पैदा करे**, इसलिए अप्रत्यक्ष रूप से फाइलों को रोकना, NOC की जटिलताएं बढ़ाना, और ट्रस्ट को प्रशासनिक उलझनों में डालना — यह सब निर्माण में देरी के लिए रणनीतिक तरीके हो सकते हैं।

 

सवाल यह भी है कि क्या ट्रस्ट की तरफ से कोई राजनीतिक या कानूनी दबाव महसूस किया जा रहा है? इस पर ट्रस्ट की ओर से अब तक कोई सीधी टिप्पणी नहीं आई है, लेकिन इतना जरूर कहा गया है कि वे **सभी कानूनी प्रक्रिया का पालन करके मस्जिद बनाएंगे**, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है और सरकार को इसमें सहयोग देना ही होगा।

 

इस बीच, **कुछ हिंदू संगठनों ने इस बात का विरोध भी किया है कि अयोध्या में किसी भी मस्जिद का निर्माण नहीं होना चाहिए**, भले ही वह कोर्ट के आदेश से ही क्यों न हो। इससे भी प्रशासन थोड़ी सतर्कता बरत रहा है और संभवतः इसे चुनाव के बाद तक टालने की कोशिश कर रहा है।

 

अब अगर स्थिति को निष्पक्ष रूप से देखें तो स्पष्ट है कि मस्जिद निर्माण **पूरी तरह रुका नहीं है**, लेकिन यह **तेजी से आगे भी नहीं बढ़ रहा**। ट्रस्ट को अब एक बार फिर से नई योजना, NOC और सरकार की सहमति के साथ प्रस्ताव भेजना होगा। लेकिन क्या यह जल्द होगा? क्या सरकार सच में सहयोग करेगी? और क्या जनता इसे सहज रूप से स्वीकार करेगी? — ये सारे सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं।

 

फिलहाल, राम मंदिर जहाँ बनकर तैयार है, वहीं मस्जिद की ज़मीन पर अभी तक एक ईंट भी नहीं रखी गई है। ट्रस्ट के मुताबिक, वे अब भी मस्जिद निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन उनका रास्ता आसान नहीं है।

 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला भले ही ऐतिहासिक था, लेकिन उसके बाद की प्रक्रिया ने ये साबित कर दिया कि **कागज़ी न्याय और ज़मीनी न्याय** में बहुत बड़ा फर्क होता है।

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