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8 मोहर्रम की फज़ीलत, हुसैनी सब्र का पैग़ाम!

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8 मोहर्रम की फज़ीलत, हुसैनी सब्र का पैग़ाम!

8th Moharram: 8 मोहर्रम इस्लामी तारीख का एक अहम दिन है, जो खास तौर पर कर्बला के वाक़ियात की याद दिलाता है। ये दिन इमाम हुसैन अ.स. और उनके अहलेबैत की कुर्बानियों का सिलसिला बयान करता है, जो दसवीं मोहर्रम यानि ‘आशूरा’ पर अपनी बुलंदी को पहुंचता है। 8 मोहर्रम को अक्सर ग़म, सब्र और इबादत का दिन समझा जाता है। इस दिन की खास फज़ीलत ये है कि इस रोज़ इमाम हुसैन अ.स. और उनके साथियों पर यज़ीदी फौज ने पानी पूरी तरह से बंद कर दिया था।

कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन अ.स. का काफिला कई दिनों से प्यासा था, लेकिन 7 मोहर्रम को जब यज़ीद की फौज ने फ़रात नदी से पानी लाने पर रोक लगा दी, तो 8 मोहर्रम को हालात और ज़्यादा सख़्त हो गए। छोटे-छोटे बच्चों की प्यास, और खेमों में पानी की एक-एक बूँद की क़िल्लत ने काफिले की हालत बहुत मुश्किल बना दी थी। मगर इसके बावजूद इमाम हुसैन अ.स. और उनके जानिसार साथियों ने सब्र और अल्लाह पर भरोसा बनाए रखा। यही सब्र, यही ईमान और यही कुर्बानी 8 मोहर्रम को एक रूहानी अहमियत देता है।

इस दिन दुनिया भर के मुसलमान, खास तौर पर शिया मुसलमान, मजलिसें करते हैं, मातम करते हैं और उस दिन को याद करते हैं जब हक़ और बातिल के बीच की जंग अपने आख़िरी मोड़ की तरफ बढ़ रही थी। इबादत, दुआ, कुरआन की तिलावत और इमाम हुसैन अ.स. की शहादत के ताजातरीन वाक़ियात पर ग़ौर करना इस दिन का हिस्सा होता है।

8 मोहर्रम हमें ये सिखाता है कि जब हालात मुश्किल हो जाएँ, जब ज़ुल्म अपनी हदें पार कर दे, तब भी हक़ के रास्ते पर कायम रहना चाहिए। ये दिन सब्र और इस्तेक़ामत (दृढ़ता) की मिसाल है। इमाम हुसैन अ.स. और उनके अहलेबैत ने ये बता दिया कि दुनिया की हर ताक़त से बड़ा अल्लाह है, और उसकी राह में दी जाने वाली कुर्बानी कभी ज़ाया नहीं जाती।

इस्लामी तारीख में 8 मोहर्रम का मुक़ाम इसलिए भी बहुत ऊँचा है क्योंकि ये आशूरा से पहले का वो दिन है जब कर्बला की ज़मीन पर हक़ और बातिल की जंग तय हो चुकी थी, लेकिन इसके बावजूद किसी ने हौसला नहीं खोया। यही जज़्बा, यही फज़ीलत हमें याद दिलाती है कि इमामत का मतलब सिर झुकाना नहीं, बल्कि सिर उठाकर हक़ की आवाज़ बुलंद करना है — चाहे उसके लिए कोई भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े।

8 मोहर्रम को याद करना, सिर्फ़ एक तारीख़ को याद करना नहीं है, बल्कि ये अपने अंदर के ज़ुल्म के खिलाफ़ उठ खड़े होने का जज़्बा जगाने का दिन है। ये दिन हर मोमिन को ये पैग़ाम देता है कि अगर इमाम हुसैन अ.स. 1400 साल पहले प्यासे रहकर भी हक़ पर डटे रहे, तो आज भी हम अपने दौर के यज़ीदी सिस्टम के सामने झुकें नहीं — बल्कि उसी हुसैनी रास्ते पर चलें।

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