
ईरान की सड़कों से उठी औरतों की आवाज़: सुप्रीम लीडर के लिए जान दे देंगे।
IRAN LIVE:ईरान को लेकर दुनिया भर में जो तस्वीर दिखाई जा रही है, वह पूरी सच्चाई नहीं है। पश्चिमी मीडिया लगातार यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि ईरान की महिलाएं सड़कों पर सरकार और सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के खिलाफ़ हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नज़र आती है। हाल के दिनों में ईरान की सड़कों पर बड़ी संख्या में महिलाएं खामेनेई के समर्थन में उतरीं, हाथों में ईरानी झंडे लिए, नारे लगाते हुए उन्होंने साफ़ कहा कि वे अपने देश, अपनी इस्लामी व्यवस्था और अपने सुप्रीम लीडर के साथ खड़ी हैं। कई महिलाओं ने मीडिया से बातचीत में कहा, “हम ज़रूरत पड़ी तो सुप्रीम लीडर के लिए जान भी दे देंगे।” यह बयान सिर्फ़ भावना नहीं, बल्कि उस भरोसे को दिखाता है जो एक बड़ा वर्ग अपने नेतृत्व पर करता है।

इन महिलाओं की आवाज़ को अंतरराष्ट्रीय मीडिया या तो दिखाता ही नहीं, या फिर जानबूझकर नज़रअंदाज़ कर देता है। कैमरे केवल वहीं घुमाए जाते हैं जहां कुछ विरोध हो, ताकि यह साबित किया जा सके कि पूरा ईरान जल रहा है। लेकिन जब लाखों की भीड़, जिसमें महिलाएं, छात्राएं, मांएं और बुज़ुर्ग शामिल हैं, सरकार और सुप्रीम लीडर के समर्थन में निकलती है, तो उसे “सरकारी रैली” कहकर खारिज कर दिया जाता है। यही है FAKE NEWS का खुला कारोबार, जहां सच्चाई नहीं, एजेंडा तय करता है कि क्या दिखाना है और क्या छुपाना है।
ईरानी महिलाओं को अक्सर पश्चिमी मीडिया में “बेबस” और “दबी हुई” दिखाया जाता है, लेकिन सड़कों पर उतरी ये महिलाएं उस कहानी को खुद झूठा साबित कर रही हैं। वे कहती हैं कि उनकी पहचान, उनकी आस्था और उनका सम्मान पश्चिमी नजरिए से तय नहीं होगा। उनके मुताबिक, ईरान को अस्थिर करने के लिए महिलाओं के नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि बड़ी संख्या में महिलाएं खुद इस साज़िश के खिलाफ़ खड़ी हैं। उनका साफ़ कहना है कि ईरान के फैसले ईरान की जनता करेगी, न कि वॉशिंगटन या तेल अवीव।
FAKE NEWS फैलाने का एक बड़ा तरीका यह भी है कि आंकड़ों और भावनात्मक तस्वीरों के ज़रिए भ्रम पैदा किया जाए। कभी कहा जाता है कि हज़ारों महिलाएं मारी गईं, कभी सैकड़ों की बात होती है, लेकिन इन दावों की कोई ठोस, स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। इंटरनेट बंद है, ज़मीनी रिपोर्टिंग मुश्किल है, फिर भी पक्के आंकड़े ऐसे पेश किए जाते हैं जैसे सब कुछ साबित हो चुका हो। सच्चाई यह है कि सूचना युद्ध में सबसे पहले सच को कुर्बान किया जाता है, ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके।
ईरान की सड़कों से उठी महिलाओं की यह आवाज़ उस एकतरफा नैरेटिव को चुनौती देती है, जो दुनिया पर थोपा जा रहा है। ये महिलाएं कह रही हैं कि वे किसी विदेशी ताकत की मोहर नहीं बनेंगी। उनके लिए सुप्रीम लीडर सिर्फ़ एक राजनीतिक चेहरा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता का प्रतीक हैं। यही वजह है कि वे खुलकर कहती हैं—“हम डरने वाली नहीं हैं।”

आज जब ईरान को लेकर शोर बहुत है, तब ज़रूरत है कि हर खबर को सवालों की कसौटी पर कसा जाए। क्योंकि जो नहीं दिखाया जा रहा, जो नहीं सुनाया जा रहा, वही अक्सर सबसे बड़ी सच्चाई होती है। और ईरान की सड़कों पर खड़ी ये महिलाएं यही बता रही हैं कि FAKE NEWS के शोर के बीच भी सच ज़िंदा है—बस उसे देखने की नीयत चाहिए।