
उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार का 76वां स्थापना दिवस मनाया गया, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर अभिलेख प्रदर्शनी एवं संगोष्ठी का आयोजन
उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार का 76वां स्थापना दिवस मनाया गया, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर अभिलेख प्रदर्शनी एवं संगोष्ठी का आयोजन
लखनऊ: उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार, लखनऊ ने आज अपने 76वें स्थापना दिवस के अवसर पर ‘1857 का स्वतंत्रता संग्राम’ विषय पर एक विशेष अभिलेख प्रदर्शनी और संगोष्ठी का आयोजन किया। कार्यक्रम की शुरुआत पूर्वाह्न 11 बजे दीप प्रज्वलन के साथ हुई, जिसमें इतिहास, अनुसंधान और अभिलेखों के क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित विद्वानों और गणमान्य अतिथियों ने भाग लिया।मुख्य अतिथि के रूप में शकुन्तला मिश्रा पुनर्वास विश्वविद्यालय के कला संकाय अधिष्ठाता एवं इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. अविनाश चन्द्र मिश्रा और विशिष्ट वक्ता के रूप में लखनऊ विश्वविद्यालय के पाश्चात्य इतिहास विभाग के सेवानिवृत्त प्रो. प्रमोद कुमार श्रीवास्तव उपस्थित रहे। प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रो. श्रीवास्तव द्वारा किया गया।प्रदर्शनी में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दुर्लभ और ऐतिहासिक अभिलेख प्रस्तुत किए गए, जिनमें नाना साहब की गिरफ्तारी का इश्तिहार, रानी लक्ष्मी बाई की मृत्यु संबंधित टेलीग्राम, उनकी संपत्ति जब्त करने का आदेश, बेगम हजरत महल का युद्ध क्षेत्र में चित्रण, अवध में स्वतंत्र सरकार की स्थापना, रेजीडेंसी में घिरे अंग्रेजों के दस्तावेज, मौलवी अहमद उल्ला शाह का टेलीग्राम तथा अन्य अभिलेख प्रमुख आकर्षण रहे। यह प्रदर्शनी आमजन के लिए 10 मई, 2025 तक खुली रहेगी।संगोष्ठी में वक्ताओं ने 1857 की क्रांति के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता प्रो. अविनाश चन्द्र मिश्रा ने इसे महज सिपाही विद्रोह न मानकर राष्ट्रीय चेतना का पुनर्जागरण बताया और इतिहास को सतत संवाद की प्रक्रिया कहा। अध्यक्षीय भाषण में प्रो. प्रमोद श्रीवास्तव ने अभिलेखागार में संरक्षित दस्तावेजों को इतिहास के जीवंत स्रोत बताते हुए शोधार्थियों से इनका अधिक से अधिक अध्ययन करने का आह्वान किया।प्रो. अर्चना तिवारी ने गिरमिटिया मजदूरों के विस्थापन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर विचार रखे, जबकि डॉ. सुशील कुमार पाण्डेय ने इतिहास को वर्तमान की समस्याओं के समाधान का उपकरण बताया। डॉ. सौरभ मिश्रा ने क्रांति को श्रमिक वर्ग के शोषण की प्रतिक्रिया कहा। डॉ. शशिकांत यादव ने पूर्वाग्रह रहित शोध की आवश्यकता पर बल दिया। डॉ. पूनम चौधरी ने गुमनाम क्रांतिकारियों के योगदान को शोध के केंद्र में लाने की बात कही। डॉ. मनीषा ने अवध के अधिग्रहण को 1857 की व्यापकता का कारण बताया। डॉ. सनोवर हैदर ने लखनऊ को ही आंदोलन की शुरुआत का केंद्र मानते हुए इस पर और शोध की आवश्यकता जताई।कार्यक्रम में 45 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। निदेशक अमित कुमार अग्निहोत्री ने अतिथियों का स्वागत किया और सहायक निदेशक (संरक्षण) विजय कुमार श्रीवास्तव ने धन्यवाद ज्ञापन किया।यह आयोजन न केवल अभिलेखों की ऐतिहासिक महत्ता को रेखांकित करता है, बल्कि शोध और समाज के बीच पुल स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
