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खामेनेई के सुरक्षा कवच से अमेरिका बौखलाया

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खामेनेई के सुरक्षा कवच से अमेरिका बौखलाया

IRAN- US Tension:  मध्य पूर्व में एक बार फिर भू-राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। हालिया रणनीतिक आकलनों में दावा किया जा रहा है कि ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर मजबूत कर दी गई है। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के नेतृत्व में अमेरिका कभी प्रत्यक्ष सैन्य विकल्प पर विचार करे भी, तो शीर्ष नेतृत्व तक सीधी पहुंच बनाना लगभग असंभव होगा।
कैसा है ईरान का “सुरक्षा कवच”?

 

सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान ने बहु-स्तरीय सुरक्षा संरचना विकसित की है। इसमें उन्नत वायु रक्षा प्रणाली, लंबी दूरी की मिसाइलें, मोबाइल लॉन्चर, भूमिगत बंकर नेटवर्क, और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमताएं शामिल हैं। तेहरान और अन्य संवेदनशील इलाकों के आसपास अत्याधुनिक रडार सिस्टम तैनात बताए जाते हैं, जो हवाई खतरों को पहले ही चरण में ट्रैक और इंटरसेप्ट करने में सक्षम हैं।
इसके अलावा, ईरान की रणनीति केवल रक्षात्मक नहीं बल्कि प्रतिरोधक (Deterrence) भी है। यानी यदि उस पर हमला होता है तो जवाबी कार्रवाई की क्षमता इतनी व्यापक हो कि विरोधी पक्ष के लिए जोखिम और लागत बहुत अधिक हो जाए। यही कारण है कि विश्लेषक इसे “सुरक्षा कवच” के साथ-साथ “रणनीतिक ढाल” भी मानते हैं।
अमेरिका के सामने क्या विकल्प?


अमेरिका के लिए किसी भी संभावित कार्रवाई में कई जटिलताएं हैं। सीधे सैन्य हमले की स्थिति में क्षेत्रीय संघर्ष भड़क सकता है, जिसमें खाड़ी देशों, इज़राइल और अन्य सहयोगियों की सुरक्षा भी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा साइबर युद्ध, प्रतिबंधों का विस्तार, और कूटनीतिक दबाव जैसे विकल्प भी चर्चा में रहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी उच्च-प्रोफाइल लक्ष्य पर कार्रवाई केवल सैन्य निर्णय नहीं होता, बल्कि उसके राजनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक परिणाम भी व्यापक होते हैं। ऐसे में अमेरिकी रणनीति बेहद संतुलित और बहु-आयामी हो सकती है।
वैश्विक असर

यदि तनाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा प्रभाव वैश्विक तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ सकता है। मध्य पूर्व में अस्थिरता का असर यूरोप और एशिया तक महसूस किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक शक्तियां भी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

 

फिलहाल दोनों देशों के बीच बयानबाजी तीखी है, लेकिन प्रत्यक्ष टकराव से बचने के संकेत भी मिलते रहे हैं। कूटनीतिक चैनलों के जरिए संवाद की संभावनाएं पूरी तरह बंद नहीं हुई हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या यह तनाव वास्तविक सैन्य संघर्ष में बदलता है या रणनीतिक संतुलन और वार्ता के जरिए स्थिति को नियंत्रित कर लिया जाता है।

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