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जब कोटेदार प्रति राशन दो किलो चावल काट रहा है तो जाएगा कहां

आटा चक्की वाले भी गेंहूं में चावल मिला कर पीस रहे हैं

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उरई (जालौन) कालपी जालौन उत्तर प्रदेश में लोग चावल कम खाते हैं वहीं सरकारी कोटे से माह में दो बार चावल मिल रहा है तो जाएगा कहां लिहाजा लोग चावल बेंच रहे हैं जिसे कई व्यापारी खरीदकर एकत्र करके बाहर मिलों में बेंच रहे है इसमें बुराई क्या है किसी की चोरी तो नहीं है वहीं हर कोटेदार एक कार्ड में दो किलो चावल खुलेआम कम दे रहा है छोटे से अधिकारी से लेकर बडे़ अधिकारी को सब पता है क्योंकि उसे भी इस चोरी का हिस्सा मिलता है जनता ने तमाम बिरोध किया सिकायत की मजाल है जो किसी कोटेदार के ऊपर कार्यवाही हुई हो अब तो एक और चलन शुरू हो गया है आटा चक्की वाले भी कोटे का चावल खरीद रहे हैं और लोग गेंहूं छान बीन के पिसाने जाते हैं चक्की वाले गेंहूं निकाल लेते हैं और उसमे उतने ही चावल मिला कर पीस देते है तभी तो रोटी का स्वाद ही बिगड़ गया है पर यह सब गलत हो रहा है इसे रोका जाना चाहिए खाद्य निरुक्षकों को आटा चक्कियों को चैक करना चाहिए पूर्ति निरीक्षक को कोटेदार की कटिंग पर ब्रेक लगाना चाहिए पर यह कैसे सम्भव है क्योकि हर कोटेदार और अधिकारी गरीबों के लिए सरकार द्वारा दिए जा रहे राशन का एक हिस्सा मिल-बांटकर खाया जा रहा है!इन पर कोई कार्यवाही नहीं होती हां व्यापारियों पर जरूर पुलिस का हंटर चल जाता है और चावल लदी लोडर पकड़ कर फीलगुड करके छोड़ देते हैं!पर वो भी क्या करें अगर पुलिस चावल पकड़कर थाने में बन्द कर दे तो सप्लाई इस्पेक्ठर उसे सरकारी चावल न होने की पुष्टि कर छुड़वा देता है और वो भी अपना फील गुड कर लेता है!इससे बेहतर तो यही सही है कि पुलिस वाले ही अपना काम कर लें तो पत्रकार साथियों आपके लिखने से कुछ नहीं होगा स्याही खत्म हो जाएगी अखबार भर जाएगा पर सिस्टम नहीं बदलेगा जो होता रहा है वही हो रहा है और होता रहेगा!पर क्या करें पत्रकार हूं तो पत्रकारिता का फर्ज तो निभाना ही पडेगा अगर गलत हो रहा है तो लिखना ही पडे़गा तो सच्चाई लिख दी अब किस पर कितना असर होगा बता नहीं सकते।
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