
दिल्ली : गृह मंत्री अमित शाह को फिर एम्स में दाखिल कराया गया है। हालांकि इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी है कि किस दिक्कत की वजह से उन्हें अस्पताल में दाखिल कराया गया है अस्पताल की तरफ से अस्पष्ट जानकारी ही मिल पायी है कि पोस्ट कोविड जांच के लिए उन्हें भर्ती किया गया है। किस बीमारी की वजह से उन्हें आनन फानन में फिर से अस्पताल ले जाया गया, इस पर गृह मंत्रालय ने भी चुप्पी साध रखी है।सरकार के तमाम दावों के बाद भी कोरोना संक्रमितों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। आम आदमी ही नहीं मंत्री और कोविड से लड़ रहे वारियर भी कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं। एहतियात बरतने के बाद भी संक्रमण फैल रहा है।
ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर देश चला रहे नेताओं की सेहत को सार्वजनिक किया जाना चाहिए या नहीं। आखिर जनता को यह जानने का हक है जिनके जिम्मे हमने देश छोड़ा है, वो उसे चलाने की क्षमता रखते भी हैं या नहीं।हालांकि ऐसे नेता उंगलियों पर ही गिने जा सकते हैं जो अपने हित से ज्यादा देशहित को अहमियत देते हों। भारत में ही नहीं अन्य देशों में भी नेता अपनी बीमारी को जगजाहिर करने से कतराते हैं। वह अपनी बीमारी को एक राज की तरह दुनिया से छुपा कर रखना चाहते हैं।
सत्ता पर बने रहने की चाहत में ही नेता अक्सर अपनी बीमारियों के बारे में जानकारियों को जनता से छुपा कर रखते हैं। पूरी दुनिया में कुछ ही देश हैं जहां के शीर्ष नेताओं ने महसूस किया कि जनता को यह मालूम होना चाहिए कि उन्होंने देश जिनके हवाले किया है, उस नेता में शासन चलाने की क्षमता है भी या नहीं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पिछले छह हफ्तों में तीन बार अस्पताल में दाखिल कराये गये हैं। एम्स से उनकी बीमारी के बारे में अब तक कुछ स्पष्ट जानकारी नहीं दी गयी है।
गृह मंत्रालय ने भी मंत्री के स्वास्थ्य और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व के मामलों में भाग लेने की उनकी क्षमता के बारे में भी बहुत कम बताया है। कहा जा सकता है कि चुप्पी बरकरार रखी है केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पिछले छह हफ्तों में तीन बार अस्पताल में भर्ती हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद देश के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नेता अमित शाह ने दो अगस्त को ट्वीट किया कि वह कोरोना से संक्रमित हैं। उन्होंने एक निजी अस्पताल में जांच करवाई।
14 अगस्त को टेस्ट में कोरोना नेगेटिव आने तक गृहमंत्री की सेहत के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी थी। अस्पताल द्वारा जारी प्रेस बयान में बताया गया कि पोस्ट कोविड देखभाल के लिए उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में ले जाया गया है। शाह को 30 अगस्त को छुट्टी दे दी गयी और दो सप्ताह के भीतर 12 सितंबर को देर रात उन्हें फिर से एम्स में भर्ती कराया गया है।
इससे पहले अगस्त में अधिकतर समय अस्पताल में भर्ती होने की वजह से भारत महीने भर बिना गृह मंत्री के ही चलता रहा है। संसद सत्र से पहले फिर अमित शाह अस्पताल में भर्ती कराये गये हैं एम्स की प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि शाह को संसद सत्र से पहले 1-2 दिनों के लिए पूर्ण चिकित्सा जांच के लिए भर्ती कराया गया है। एम्स के इस अस्पष्ट विवरण के अलावा गृह मंत्रालय से भी कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली है जिससे यह पता चले कि आखिर गृह मंत्री अमित शाह की हालत कैसी है।
शाह को महत्वपूर्ण संसद सत्र में हिस्सा लेना है। मगर अस्पताल में भर्ती होने का मतलब होगा कि गृह मंत्री संसद को प्रमुख नीतिगत मामलों के बारे में अवगत कराने के लिए उपलब्ध नहीं होंगे उनके पोर्टफोलियो में महत्वपूर्ण आंतरिक-सुरक्षा मुद्दे शामिल हैं। इनमें कोविड-19 महामारी से संबंधित मसले भी हैं, जिनसे भारत को निपटना है। भारत की हालत इतनी बुरी हो गयी है कि वह कोरोना के मामले में दुनिया में दूसरा सबसे खराब प्रभावित देश बन गया है। भारत में कोरोना संक्रमितों की तादाद तेजी से बढ़ती जा रही है।
आमतौर पर भारत में लोगों का ये मानना है कि जब तक एक व्यक्ति सेहतमंद है वह सार्वजनिक पद पर काबिज रह सकता है। यह तय करने का कोई उपाय भी सामने नहीं है जिससे पता किया जा सके कि कहीं नेता की बिगड़ती सेहत का असर हमारे देश के शासन और नीति निर्माण पर तो नहीं पड़ रहा है। यह भी पता नहीं चलता है कि नेता के बीमार होने पर आखिर नीतियां बनाता कौन है। इन मुद्दों पर गौर भी नहीं किया जाता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि एक नेता की सेहत के बारे में खुलासा करने में पारदर्शिता और व्यक्तिगत गोपनीयता के बीच संतुलन बनाये रखने की जरूरत है। नेता की सेहत के बारे में खुलासा करना सरकार की जवाबदेही बनती है। ऐसा न करने पर राष्ट्र, सरकार और सार्वजनिक हित प्रभावित हो सकता है। इस पारदर्शिता का फायदा यह होगा कि वोटर एक स्वस्थ नेता चुन पायेंगे जो सरकारी कार्यालय में अपनी जिम्मेदारियों को निभा सके।
आम तौर पर नेताओं की सेहत के बारे में कोई जानकारी न होने की वजह से कई बार ऐसे लोग भी चुन लिये जाते हैं जो अस्वस्थ होने के कारण अपना काम नहीं कर पाते हैं। हालांकि, अन्य नागरिकों की तरह नेताओं को भी हक है कि उनकी व्यक्तिगत जानकारियों को सार्वजनिक न किया जाए उनकी सेहत की जानकारियां सार्वजनिक कर देने के बाद विपक्षी नेता इसका गलत फायदा उठा सकते हैं। नेताओं की सेहत से जुड़ी जानकारियों को सार्वजनिक कर देने से वित्तीय बाजारों पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है।
यह तय करना बिल्कुल भी आसान नहीं है कि नेताओं की सेहत की जानकारी को सार्वजनिक किया जाय या नहीं। फिर भी यह तय करने का जिम्मा नेताओं या उनके संरक्षकों पर नहीं छोड़ा जा सकता है जनहित के लिए मंत्रियों की स्वास्थ्य स्थिति का खुलासा करना संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं में शामिल किया जाना चाहिए। ऐसा करने से भारतीय लोकतंत्र को मजबूती ही मिलेगी। देश की प्रगति के लिए जरूरी है कि हमारे देश के नीति निर्माता भी सेहतमंद हों जिससे हम निरंतर आगे बढ़ते रहे