
जन्नतुल बक़ी क्यों तोड़ा गया?
मदीना मुनव्वरा, सऊदी अरब में एक बहुत ही पवित्र और ऐतिहासिक कब्रिस्तान है जिसे “जन्नतुल बक़ी” कहा जाता है। यह कब्रिस्तान सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि इस्लाम के इतिहास का बहुत बड़ा हिस्सा है। यहां पैगंबर हज़रत मोहम्मद ﷺ के कई घरवाले, सहाबा, औलिया और जानी-मानी हस्तियां दफन हैं। मुसलमान इसे बहुत अदब और इज्ज़त से देखते हैं।

अब सवाल आता है कि — क्या यहां कभी बुलडोजर चला? और अगर चला, तो क्यों?
तो जवाब है — हां, एक बार बहुत साल पहले, 1925-26 के दौरान**। उस वक़्त सऊदी अरब में नई हुकूमत बनी थी, और उन्होंने जन्नतुल बक़ी में मौजूद सभी मकबरे, गुंबद और ऊँची-ऊँची कब्रें गिरा दीं। उनका मानना था कि इस्लाम में कब्रों पर इमारत बनाना, सजावट करना, या वहां जाकर दुआओं को कुछ हद तक इबादत जैसा बनाना सही नहीं है। उनके इस सोच को वहाबी विचारधारा कहा जाता है।

इस सोच के मुताबिक, इस्लाम में कब्रों को सजाने या उनके आस-पास इमारतें खड़ी करने से लोग कब्रों की पूजा करने लगते हैं, जो कि शिर्क (यानी अल्लाह के साथ किसी को बराबरी देना) माना जाता है। इसलिए उन्होंने जन्नतुल बक़ी में मौजूद सभी सजावटें, गुंबद और ढांचे गिरा दिए, ताकि कब्र सिर्फ सादगी से बनी रहें।
अब ये काम उन्होंने बुलडोजर से किया या किसी और तरीके से, ये उस वक़्त की टेक्नोलॉजी पर निर्भर था। लेकिन आज जब लोग इस घटना को याद करते हैं, तो अक्सर कहते हैं कि “बुलडोजर चलाया गया”, मतलब मकबरे और इमारतें गिराई गईं।
यह घटना आज भी बहुत से मुसलमानों के लिए दुख की बात है। खासकर शिया और सूफी मुसलमानों के लिए, जो औलिया और अहले बैत की कब्रों पर ज़ियारत करना इज्ज़त की बात मानते हैं। हर साल 8 शव्वाल (हिजरी कैलेंडर के हिसाब से) को “यौमे इनहिदामे जन्नतुल बक़ी” यानी “बक़ी की तबाही का दिन” के तौर पर याद किया जाता है। इस दिन कई मुस्लिम देश और संगठन शांतिपूर्वक प्रदर्शन करते हैं और सऊदी सरकार से मांग करते हैं कि वहां फिर से पुराने ढांचे बनाए जाएं।
दुनिया भर में मुस्लिम लोग चाहते हैं कि जन्नतुल बक़ी को फिर से उसी तरह बनाया जाए जैसा वो पहले था। यानी जो मकबरे गिराए गए थे, उन्हें फिर से बनाया जाए — ताकि वहां ज़ियारत के लिए आने वाले लोग आसानी से पहचान सकें कि कौन-कौन वहां दफन हैं।
अब बात करते हैं इस्लामिक नजरिए से। इस मुद्दे पर मुसलमानों के बीच दो अलग राय पाई जाती हैं। एक तरफ़ वे लोग हैं जो मानते हैं कि कब्रों को सजाना, वहां इमारतें बनाना या उनकी ज़ियारत को इबादत जैसा बनाना इस्लाम के खिलाफ है। दूसरी तरफ़ वे लोग हैं जो कहते हैं कि ज़ियारत करना, इज्ज़त देना और मकबरों को पहचान के लिए बनाना एक अच्छी बात है — जब तक उसे पूजा का रूप न दिया जाए।
अब दुनियावी नजरिए से देखें तो सऊदी अरब एक इस्लामिक मुल्क है, लेकिन वहां की सरकार एक खास विचारधारा के अनुसार काम करती है। उन्होंने जो किया, वो उनकी समझ और धार्मिक सोच के हिसाब से था। कई देशों और मुस्लिम संगठनों ने आज तक मांग की है कि इस फैसले को बदला जाए और जन्नतुल बक़ी को फिर से बनवाया जाए, लेकिन सऊदी सरकार अब तक इस पर कोई फैसला नहीं ले पाई है।
तो कुल मिलाकर, जन्नतुल बक़ी पर बुलडोजर कोई आज की घटना नहीं है। ये 100 साल से भी पुरानी बात है, लेकिन इसका ग़म आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा है। लोग इसे सिर्फ एक कब्रिस्तान नहीं, बल्कि अपने इमान और इतिहास की एक पवित्र निशानी मानते हैं।
जन्नतुल बक़ी की ज़मीन आज भी वहीं है, कब्रें भी वहीं हैं, लेकिन ऊँचे गुंबद, मकबरे और निशानियां अब नहीं हैं। लोग आज भी वहां जाते हैं, दुआ करते हैं, लेकिन एक सादे मैदान की तरह।
बहुत से मुस्लिम चाहते हैं कि आने वाले वक़्त में ये जगह फिर से वैसी ही बनाई जाए, जैसी पहले थी — ताकि नई पीढ़ी भी देख सके कि हमारे इतिहास के कितने बड़े लोग वहां आराम कर रहे हैं।