
क्या दुनिया अब भी खामोश रहेगी?
Gaaza News: गाज़ा एक बार फिर जल रहा है — लेकिन इस बार आग हथियारों से नहीं, मासूमों के खून से लगी है। इज़रायल की ओर से किए गए ताज़ा एयरस्ट्राइक में उस वक्त कई मासूम बच्चों की जान चली गई, जब वे सिर्फ पानी भरने के लिए घरों से बाहर निकले थे।

यह हमला ऐसे समय में हुआ, जब गाज़ा में पीने के पानी की भारी किल्लत है। युद्ध और नाकेबंदी के बीच स्थानीय लोग किसी तरह टैंकर या सार्वजनिक नलों से पानी जमा करने की कोशिश कर रहे हैं। बच्चों का एक समूह, हाथ में छोटी-छोटी बाल्टियाँ लिए पानी भरने पहुँचा था — और तभी आसमान से मौत बरसाई गई।

चश्मदीदों के अनुसार, हमला अचानक हुआ और कई बच्चे मौके पर ही मारे गए। कुछ बच्चों के शव उनके बर्तन और चप्पलों के पास पड़े मिले। स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि घायल बच्चों को अस्पताल पहुँचाने की कोशिश की गई, लेकिन कई ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।

इस हमले की खबर फैलते ही दुनिया भर से प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गई हैं। संयुक्त राष्ट्र, रेड क्रॉस और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस हमले की निंदा करते हुए इसे ‘युद्ध अपराध’ बताया है। सोशल मीडिया पर भी ग़ुस्सा साफ झलक रहा है — #GazaUnderAttack और #SaveGaza ट्रेंड कर रहा है।
फिलिस्तीनी अधिकारियों ने इसे ‘जानबूझकर किया गया हमला’ करार दिया है, जबकि इज़रायली सेना का कहना है कि वह “आतंकवादियों के ठिकानों को निशाना बना रही थी।” लेकिन सवाल यह है — क्या पानी भरते निहत्थे बच्चे आतंकवादी थे?
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि युद्ध में सबसे ज़्यादा कीमत कौन चुका रहा है? मासूम, निर्दोष, और बेसहारा — वे जिनका इस संघर्ष से कोई लेना-देना ही नहीं।