
UCC लागू होगा? हाईकोर्ट ने उठा दिया बड़ा सवाल।
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान जो बातें कहीं, उन्होंने पूरे देश में इस मुद्दे पर बहस को फिर से ज़ोर पकड़ने पर मजबूर कर दिया। मामला **बाल विवाह** से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ अभी भी बाल विवाह को वैध मानते हैं, जबकि **POCSO एक्ट** और **नया भारतीय न्याय संहिता (BNS)** इसे साफ तौर पर अपराध मानते हैं। अब सोचिए, एक ही देश में एक ही काम को एक कानून अपराध कहता है, और दूसरा उसे सही ठहराता है — तो क्या ये सही है?

कोर्ट ने कहा कि इससे न सिर्फ कानून में भ्रम पैदा होता है, बल्कि पुलिस, वकील और जजों को भी समझ नहीं आता कि किस कानून को लागू करें। और जब न्यायपालिका खुद उलझन में हो, तो आम जनता का क्या होगा?
इसीलिए कोर्ट ने सवाल उठाया — **”क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि देश एक समान नागरिक संहिता की तरफ बढ़े?”** कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी पर्सनल लॉ को देश के राष्ट्रीय कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए।
अब सवाल आता है कि **Uniform Civil Code** आखिर है क्या?
UCC का मतलब है कि भारत के हर नागरिक के लिए – चाहे वह हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिख, ईसाई या कोई और – एक जैसे कानून हों। ये कानून शादी, तलाक, विरासत, गोद लेना, संपत्ति के बंटवारे जैसी चीज़ों पर लागू होंगे। अभी क्या होता है कि हर धर्म का अपना अलग-अलग पर्सनल लॉ है। जैसे – हिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम पर्सनल लॉ, ईसाई विवाह अधिनियम आदि। इनकी वजह से कई बार महिलाएं या बच्चे न्याय से वंचित रह जाते हैं।
उदाहरण के लिए, कुछ साल पहले तक मुस्लिम पर्सनल लॉ में **तीन तलाक** वैध था। एक पति सिर्फ “तलाक तलाक तलाक” बोलकर अपनी पत्नी से रिश्ता खत्म कर सकता था। सोचिए, एक महिला की पूरी जिंदगी सिर्फ तीन शब्दों पर निर्भर हो जाए, क्या ये सही है? बाद में सरकार ने इसे कानून बनाकर खत्म किया, लेकिन ये एक उदाहरण है कि पर्सनल लॉ कई बार आधुनिक समय के साथ नहीं चलते।
अब एक बात समझने वाली है – UCC कोई धर्म के खिलाफ नहीं है। इसका मकसद सिर्फ ये है कि हर नागरिक को **बराबर अधिकार** मिले, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो। जब हम कहते हैं कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, तो इसका मतलब है कि देश का कानून सबके लिए एक समान होना चाहिए।
**संविधान** की बात करें, तो उसमें भी समानता और न्याय को सबसे ऊपर रखा गया है। **अनुच्छेद 44** में साफ तौर पर लिखा है कि सरकार को देश में एक समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करनी चाहिए। यानी संविधान भी यही चाहता है, लेकिन अब तक इस दिशा में पूरे देश में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
हाँ, **उत्तराखंड राज्य** ने हाल ही में पहला राज्य बनकर UCC को लागू किया है। इससे एक मिसाल बनी है कि इसे पूरे देश में भी लागू किया जा सकता है।
अब बात करते हैं विरोध की। कुछ **अल्पसंख्यक संगठन**, खासतौर पर मुस्लिम संगठनों का कहना है कि UCC से उनकी धार्मिक आज़ादी पर असर पड़ेगा। उनका मानना है कि धर्म के मुताबिक जीने और फैसले लेने का अधिकार संविधान उन्हें देता है।
लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि संविधान सिर्फ धार्मिक आज़ादी नहीं, बल्कि **समानता और न्याय** की भी बात करता है। अगर कोई धर्म किसी महिला को संपत्ति में हिस्सा नहीं देता, या तलाक में भेदभाव करता है, तो क्या हम उस पर चुप रहें?
आज भी कई धर्मों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं मिलते। शादी, तलाक, गोद लेने या संपत्ति में हिस्सेदारी — इन सभी मामलों में महिलाओं को बराबरी नहीं मिलती, और इसका आधार सिर्फ उनका धर्म होता है। क्या ये न्याय है?
हम यह भी देख रहे हैं कि जब राष्ट्रीय कानून और पर्सनल लॉ आपस में टकराते हैं, तो समाज में भ्रम फैलता है। लोगों को समझ नहीं आता कि उन्हें किस कानून का पालन करना है। और इसका नुकसान अंत में आम जनता को ही होता है।
दिल्ली हाईकोर्ट की हालिया टिप्पणी इस बात का संकेत है कि अब अदालतें भी चाहती हैं कि ऐसा कोई एक कानून हो, जो सब पर लागू हो — जिससे कोई भी इंसान कानून की जटिलताओं में फंसकर न्याय से वंचित न रह जाए।
सरकार ने भी कई बार UCC पर बात की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद कह चुके हैं कि “देश दो कानूनों से नहीं चल सकता।” कानून आयोग ने भी जनता से राय मांगी थी। यानी माहौल धीरे-धीरे तैयार हो रहा है।
तो सवाल ये नहीं है कि UCC लागू हो या नहीं — सवाल ये है कि **कब और कैसे** हो?
इस प्रक्रिया में सभी को शामिल किया जाना चाहिए — आम जनता, सभी धर्मों के प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला संगठनों और न्यायपालिका को। UCC जब भी लागू हो, वह ऐसा हो जो भारत के **संविधान के मूल सिद्धांतों**, जैसे समानता, न्याय और स्वतंत्रता को मज़बूत करे।
अंत में मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि अगर भारत को एक मजबूत, समान और न्यायपूर्ण समाज बनाना है, तो हमें ऐसे कानूनों की ज़रूरत है जो सबके लिए बराबर हों। UCC की ओर कदम बढ़ाना केवल एक कानून बनाना नहीं है — ये एक सोच बदलने की दिशा में कदम है। एक सोच, जिसमें हर भारतीय को, चाहे वो किसी भी धर्म, जाति या लिंग का हो — बराबरी का हक मिले।