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डायन और दहशत,दिल दहलाने वाली खबर है।

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डायन और दहशत,दिल दहला देने वाली खबर है।

इंडिया Live; पूर्णिया, बिहार से आई यह खबर दिल दहला देने वाली है। एक ही परिवार के पाँच लोगों को सिर्फ इस शक में जिंदा जला दिया गया कि वे डायन हैं। ये घटना जितनी डरावनी है, उतनी ही चिंता की बात भी है। इसे अपवाद बताकर भुला देना आसान है, लेकिन जब आप देशभर की खबरों को देखें, तो साफ़ समझ आता है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। कहीं डायन होने के शक में हत्या, तो कहीं गाय चोरी या गौ तस्करी के नाम पर पीट-पीटकर मार डालना – ऐसे मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

दरअसल, भीड़ के इस इंसाफ की जड़ें बहुत गहरी हैं। अंधविश्वास, झूठे शक, अफवाहें और कानून की कमजोरी, ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना चुके हैं जहाँ इंसानी जान की कीमत खत्म हो गई है। कोई किसी पर जादू टोना करने का आरोप लगा देता है, और फिर भीड़ फैसला कर लेती है कि उसे सज़ा देनी है। पुलिस तब तक नहीं पहुँचती जब तक बहुत देर न हो जाए। और अगर पहुँच भी जाए तो कार्रवाई अक्सर नाममात्र की होती है।

यह सिर्फ किसी एक राज्य की कहानी नहीं है। झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश, असम और उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में डायन बता कर मारने की घटनाएं होती रही हैं। इनमें ज़्यादातर मामलों में महिलाएं निशाना बनती हैं, जो समाज में पहले से ही कमजोर स्थिति में होती हैं। कभी उन्हें परिवार की बीमारी या मौत का जिम्मेदार बताया जाता है, कभी सूखे या अनहोनी का कारण। बिना किसी सबूत के लोग हत्या कर देते हैं, और फिर गाँव के लोग चुप हो जाते हैं। डर और अंधविश्वास की ये चुप्पी सबसे खतरनाक होती है।

चौंकाने वाली बात यह है कि ये अंधविश्वास अब सिर्फ गाँवों तक सीमित नहीं हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया के ज़माने में टोटकों और जादू टोने से जुड़े वीडियो लाखों लोगों तक पहुँचते हैं। इन वीडियोज़ को देखकर लोग झूठे इलाज करते हैं, ढोंगी बाबाओं की बातों में आ जाते हैं और कभी-कभी किसी को दोषी मानकर उसके साथ हिंसा कर बैठते हैं। ये दर्शाता है कि विज्ञान और तर्क के जिस रास्ते पर हमारा देश चलना चाहता था, वह रास्ता अब धुँधला होता जा रहा है।

 

सरकारें अक्सर ऐसी घटनाओं पर दुख तो जताती हैं, लेकिन ठोस कदम कम ही उठाए जाते हैं। कानून तो हैं, लेकिन उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति और जागरूकता की भारी कमी है। शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और तर्कशक्ति को बढ़ावा देना सिर्फ किताबों में नहीं, ज़मीनी स्तर पर होना चाहिए। जब तक समाज में ये सोच नहीं बदलेगी कि किसी की शक्ल, जाति, लिंग या हालत देखकर उसे जादूगर या डायन करार दिया जा सकता है, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी।

 

पूर्णिया की इस घटना में पाँच जिंदगियाँ चली गईं, एक पूरा परिवार खत्म हो गया। लेकिन सवाल है – क्या इसके बाद कुछ बदलेगा? क्या अगली बार कोई भीड़ किसी को मारने से पहले रुकेगी? क्या कानून उस भीड़ तक पहुँचेगा? या फिर हम अगली ऐसी खबर का इंतज़ार करेंगे और फिर उसे भी अपवाद बता देंगे? यह सिर्फ सरकार का नहीं, हम सबका सवाल है, और इसका जवाब भी हमें मिलकर देना होगा।

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