
दिल्ली : नगालैंड में सुरक्षाबलों के 13 नागरिकों की हत्या के कारण पूर्वोत्तर से सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम, 1958 यानी AFSPA को वापस लेने की मांग जोर पकड़ने लगी है पहले ही कई नागरिक संगठन और इलाके के राजनेता वर्षों से अधिनियम की आड़ में सुरक्षाबलों पर ज्यादती का आरोप लगाते हुए इस कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। आफस्पा असम, नगालैंड, मणिपुर (इंफाल नगर परिषद क्षेत्र को छोड़कर), अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग, लोंगडिंग और तिरप जिलों के साथ असम की सीमा से लगे अरुणाचल प्रदेश के जिलों के आठ पुलिस थाना क्षेत्रों में आने वाले इलाकों में लागू है रविवार को सुरक्षाबलों की फायरिंग में 14 नागरिकों की मौत के बाद नगालैंड में एक बार फिर से आफ्स्पा कानून हटाए जाने की मांग तेज हो गई है। यह घटना ऐसे समय हुई है जब केंद्र सरकार लगातार नगा विद्रोही गुटों के साथ शांति वार्ता कर रही है। इस बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने पीएम मोदी से मुलाकात भी की है
ग्रामीणों की हत्या सभी के लिए आंखें खोलने वाली होनी चाहिए
उन्होंने दावा किया कि नगालैंड के मोन की घटना से अतीत की भयानक यादें ताजा हो गईं जब कई मौकों पर सुरक्षा बलों ने उग्रवाद से लड़ने के नाम पर नरसंहार किया, निर्दोष ग्रामीणों को प्रताड़ित किया और महिलाओं से दुष्कर्म किया टीआईपीआरए के अध्यक्ष प्रद्योत देब बर्मा ने कहा कि जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और अफस्पा जैसे कानूनों को निरस्त किया जाना चाहिए। असम से राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार अजीत कुमार भुयान ने कहा कि ग्रामीणों की हत्या सभी के लिए आंखें खोलने वाली होनी चाहिए
सुरक्षा बलों की कार्रवाई एक अक्षम्य और जघन्य अपराध
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) के मुख्य सलाहकार समुज्जल कुमार भट्टाचार्य ने कहा, ‘सुरक्षा बलों की कार्रवाई एक अक्षम्य और जघन्य अपराध है।’ उन्होंने आरोप लगाया कि यह घटना क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए सरकार की अनिच्छा को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा के लिए कठोर और अलोकतांत्रिक आफस्पा को निरस्त किया जाना चाहिए।