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अब लाचारी नहीं रही रीढ़ की सर्जरी

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नई दिल्ली    रीढ़ की हड्डी का संकरा होना बढ़ते उम्र (50 वर्ष से ज्यादा) व बुढ़ापे की आम बीमारी है. यह साधारणत: रीढ़ की हड्डी में बढ़ती उम्र के साथ टूट-फूट या घिसाव के कारण होती है. गठिया भी बढ़ती उम्र के साथ इस बीमारी का मूल कारण है. इस बीमारी में नसें संकरे रास्ते में फंस कर जाम हो जाते हैं. इस बीमारी के शुरूआत में कुछ दूर चलने पर या काफी देर खड़े होने पर लक्षण नजर आते है. जैसे :- दोनों पैरों में सुन्नापन आना या चीटियों सी चलना व सूइयों सा चूभना या जलन जैसा महसूस होना. इसके अलावा कमर में दर्द या पैरों में सियाटिका का होना. पैरों व बटक में भारीपन या थकावट या बैचेनी. पैरों में कमजोरी आना या मल-मूत्र पर नियंत्रण खोना.
नई दिल्ली स्थित पीएसआरआई हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट न्यूरोसर्जरी डॉ. अमिताभ गुप्ता का कहना है कि शुरू में तो इन लक्षणों में कुछ देर बैठने पर आराम आता है व मरीज फिर से कुछ दूर तक चल पाता है. अंतत: समय के साथ मरीज न चल पाता है, न खड़ा हो पाता है व चरपाई पकड़ लेता है. इस स्थिति को आने में कुछ साल लग जाते हैं. जिस दौरान वो डॉक्टर को दिखता है व दवाईयों से ही इलाज की कोशिश करता है. इस बीमारी के इलाज में दवाईयां नकाम सिद्ध होती है व सर्जरी से ही आराम आता है. सर्जरी ना कराने का मूल कारण है कि समाज में यह वहम है कि रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन के बाद दोनों टागें बेकार हो जाती है और फिर पुरा जीवन चरपाई पर ही व्यतीत करना पड़ता है. अफसोस यह सोच पढ़े-लिखे लोगों की भी है.
आज विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है, हम दूसरे ग्रहों की ओर ले जाने की तैयारी कर रहे है और साथ ही मनुष्य के कृत्रिम अंग विकसित करने और उन्हें ट्रांसप्लांट करने के तरीके ढूढ़ रहे है. वही दूसरी ओर रीढक़ी हड्डी की बीमारी को समाज की सोच ने मरीज को इतना मजबूर कर दिया है कि वे इसके कारण अपनी जिंदगी को अपंग जैसा या लाइलाज बना लेते है. इस बीमारी को आसानी से सर्जरी के द्वारा ठीक किया जा सकता है. डॉ.अमिताभ गुप्ता का कहना है कि रीढ़ की बड़ी हुई हड्डी को काट कर नसों को खोला जाता है व जिन लोगों में बढ़ती आयु के कारण स्पाइन अस्थिर हो जाती है, उनमें मजबूती के लिए पेंच व रोड़ स्पाइन सर्जरी के दौरान ही डाल दिये जाते हैं. ये स्पाइन सर्जरी उतनी ही सुरक्षित है जितनी की हार्निया या गलैड ब्लेडर की कोई सर्जरी. इस बीमारी से बचने के लिए नियमित व्यायाम व वजन नियंत्रित रखना जरूरी है. रीढ़ की हड्डी को कसरत द्वारा लचीला रख कर भी इस मर्ज से बचा सकता है. 

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