
लखनऊ में ताज़िये की रिवायत, ताज़िया, तहज़ीब और अज़मत!
Lucknow Moharram: लखनऊ, तहज़ीब और शाइस्तगी का शहर, जहां मोहब्बत सिर्फ लफ़्ज़ों में नहीं, बल्कि रस्मों और रवायतों में भी बसती है।
इसी शहर में मोहर्रम के महीने की शुरुआत होते ही फिज़ा में एक अलग सी सन्नाटी सी अज़मत फैल जाती है। यहां ताज़िये की रवायत सदियों पुरानी है – एक ऐसी रवायत जो ना सिर्फ ग़म-ए-हुसैन की याद दिलाती है, बल्कि इंसानियत, वफ़ा और कुर्बानी की तालीम भी देती है।

इस कहानी की शुरुआत होती है चौक की तंग गलियों से, जहां बुज़ुर्गो की बातें अब भी हवा में गूंजती हैं। वहां एक बुज़ुर्ग ताज़ियादार, जनाब रज़ा अली, हर साल अपने दादा और परदादा की तरह ताज़िया बनाते हैं। ताज़िया क्या है? एक मुक़द्दस अमानत, जो काग़ज़, बांस और मेहनत से नहीं, बल्के अकीदत से बनती है। उनके घर के आंगन में जब ताज़िये की पहली कमर बांधी जाती है, तो पूरा मोहल्ला इकट्ठा होता है। कोई काग़ज़ तर करता है, कोई कारीगरी करता है, और कोई सिर्फ बैठकर सलाम पढ़ता है।
रज़ा अली कहते हैं, “ये ताज़िया सिर्फ एक ढांचा नहीं है, ये मेरे मौला हुसैन की याद में पेश की जाने वाली मोहब्बत की पेशकश है।” जब ताज़िया तैयार होता है, तो उसकी बुलंदी आसमान से बातें करती है – उसकी मिनारें, उसकी झलक, उसकी चमक, सब कुछ मानो करबला की दास्तान कह रही हो।
मोहर्रम की दसवीं तारीख को जब ताज़िये का जुलूस निकलता है, तो पूरे लखनऊ की रूह ग़मगीन हो जाती है। हज़ारों की भीड़, काले लिबास में लिपटी, ‘या हुसैन’ की सदाएं बुलंद करती है। बच्चे, बूढ़े, औरतें – सबका दिल एक ही धड़कन पर चलता है – शहादत की अज़मत पर। अज़ाख़ाने सजते हैं, नौहे पढ़े जाते हैं, मातम होता है। और जब ताज़िया कर्बला (स्थानीय कर्बला मैदान) पहुंचता है, तो जैसे पूरा लखनऊ झुककर सलाम करता है उस जज़्बे को, जो क़ुरबानी और इंसाफ की मिसाल बन गया।
रज़ा अली अब बूढ़े हो चले हैं, लेकिन कहते हैं, “जब तक मेरी सांस चलेगी, ताज़िया बनता रहेगा। ये रवायत नहीं टूटनी चाहिए। ये सिर्फ मज़हबी नहीं, तहज़ीबी अमानत है।” उनके पोते अब ताज़िया बनाना सीख रहे हैं – बांस काटना, काग़ज़ सजाना, और सबसे अहम – अकीदत से हर काम करना।
लखनऊ का ये ताज़िया ना सिर्फ एक साजिशी दौर में इत्तेहाद की मिसाल है, बल्कि आने वाली नस्लों को ये पैग़ाम देता है कि मोहब्बत, वफ़ा और कुर्बानी की कहानी कभी पुरानी नहीं होती। हर साल ताज़िये की शक्ल बदलती है, लेकिन उसका मतलब वही रहता है – “इंसानियत सबसे ऊपर।”