
बिहार में चुनावी संग्राम शुरू, कौन बनेगा बिहार का मुख्यमंत्री?
बिहार की राजनीति एक बार फिर गरम हो गई है। चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है और सभी पार्टियां अपने-अपने तरीके से मैदान में उतरने की तैयारी कर रही हैं। इस बार का चुनाव और भी दिलचस्प होने वाला है क्योंकि मुद्दे गंभीर हैं और टक्कर भी तगड़ी है। एक तरफ है एनडीए (यानि बीजेपी और जेडीयू का गठबंधन), जो अभी सत्ता में है। दूसरी तरफ है महागठबंधन, जिसमें आरजेडी, कांग्रेस, लेफ्ट पार्टियां और कुछ छोटे दल शामिल हैं। इसके अलावा कुछ नए और छोटे दल भी चुनाव लड़ने को तैयार हैं, जो सरकार बनाने में किंगमेकर बन सकते हैं।
अगर हम आज की राजनीति की बात करें, तो बिहार में लोगों का मन थोड़ा डांवाडोल है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता पहले जैसी नहीं रह गई है। बार-बार पार्टी बदलने की वजह से लोग उनके इरादों को लेकर थोड़े कन्फ्यूज हैं। कई लोग मानते हैं कि अब नीतीश जी थक चुके हैं और राज्य को नए और ऊर्जावान नेता की ज़रूरत है। बीजेपी भी अब खुद को जेडीयू से ज़्यादा ताकतवर दिखाने की कोशिश कर रही है। अंदरखाने यह भी चर्चा है कि बीजेपी किसी नए चेहरे को सीएम बना सकती है।
वहीं, तेजस्वी यादव ने आरजेडी को फिर से एक मज़बूत पार्टी के तौर पर खड़ा किया है। उन्होंने बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन जैसे मुद्दों को उठाकर युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है। पिछले चुनाव में भले ही उन्हें सरकार बनाने का मौका न मिला हो, लेकिन उनकी रैलियों में भीड़ देखकर लगता है कि इस बार मुकाबला कड़ा होगा। मुस्लिम और यादव वोटर अब भी उनके साथ मज़बूती से खड़े हैं। अगर महागठबंधन में सीटों का सही बंटवारा होता है, तो वे इस बार सरकार बना सकते हैं।
लोगों की बात करें तो नीतीश सरकार को लेकर मिली-जुली राय है। कुछ लोग कहते हैं कि सड़क, बिजली और कानून व्यवस्था में सुधार हुआ है, लेकिन बड़ी संख्या में युवा और ग्रामीण लोग बेरोजगारी और पलायन से परेशान हैं। लोग कहते हैं कि हर बार चुनाव में वही वादे दोहराए जाते हैं, लेकिन असल ज़िंदगी में बहुत कुछ नहीं बदलता। युवा खास तौर पर नौकरी और परीक्षा सिस्टम से नाराज़ हैं। पेपर लीक, भर्ती में देरी और भ्रष्टाचार से उनका भरोसा सरकार पर कम हुआ है।
लोगों का कहना है कि “सिर्फ पटना में कुछ विकास हुआ है, बाकी जिलों में हालत जैसी की तैसी है।” इस बार युवा वोटर क्या फैसला करेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह चुनाव जाति के समीकरण, मजबूत गठबंधन और स्थानीय मुद्दों पर ही तय होगा। ऊंची जाति, पिछड़ी जाति और मुस्लिम वोटर किसे चुनते हैं, यही इस चुनाव का नतीजा तय करेगा। बीजेपी को उम्मीद है कि मोदी का नाम और केंद्र की योजनाएं उनके लिए फायदेमंद होंगी, लेकिन नीतीश सरकार के खिलाफ नाराज़गी को भी वे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। कांग्रेस भी इस बार थोड़ा सोच-समझकर चल रही है ताकि गठबंधन में कोई बड़ा झगड़ा न हो।
इस बार महिला वोटर भी अहम भूमिका निभा सकती हैं। सरकारी योजनाओं का सीधा फायदा महिलाओं तक पहुंचा है — जैसे गैस सिलेंडर, राशन, बैंक अकाउंट वगैरह — लेकिन बढ़ती महंगाई और घर की परेशानियों को लेकर महिलाएं सवाल भी उठा रही हैं। वे अब खुलकर सरकार से जवाब मांग रही हैं।
इसके अलावा पप्पू यादव, चिराग पासवान और कुछ अन्य छोटे दल भी मैदान में हैं। भले ही ये सरकार न बना पाएं, लेकिन बड़े दलों का खेल बिगाड़ सकते हैं।
अगर बात करें कि कौन जीत सकता है, तो यह कहना अभी मुश्किल है। अगर महागठबंधन एकजुट रहता है और सही मुद्दों पर बात करता है, तो वे सरकार बना सकते हैं। वहीं, अगर एनडीए में सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा और मोदी फैक्टर काम कर गया, तो सत्ता फिर उन्हीं के पास जा सकती है। नतीजे इस बात पर भी निर्भर करेंगे कि कितने लोग वोट डालते हैं और युवा किसे चुनते हैं।
आखिर में कहा जा सकता है कि इस बार बिहार का चुनाव तय करेगा कि जनता असली विकास को वोट देती है या फिर फिर से जात-पात और भावनाओं की राजनीति हावी होती है। इस बार एक तरफ पुराने नेता और अनुभव हैं, तो दूसरी तरफ युवाओं की उम्मीदें और नई सोच। फैसला अब जनता के हाथ में है — और इस बार वह सिर्फ सुनेगी नहीं, सोच-समझकर वोट भी करेगी।
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