
GST राहत या सिर्फ लॉलीपॉप?
Bihar News: बिहार में हाल ही में कुछ राजनीतिक दलों और व्यापारी संगठनों द्वारा बंद बुलाया गया था। दावा किया गया था

कि यह बंद आम जनता की आवाज़ है और इसके ज़रिए सरकार तक महंगाई, बेरोज़गारी और व्यापारियों की तकलीफें पहुँचाई जाएंगी। लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आई।

सुबह से ही प्रमुख शहरों — पटना, गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, दरभंगा — में ज़िंदगी सामान्य नजर आई। सड़कों पर ट्रैफिक था,

स्कूल-कॉलेज खुले रहे, दुकानें भी समय पर खुल गईं। सोशल मीडिया पर जो तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए, उनमें यह साफ देखा गया कि आम जनता ने इस बंद को खास समर्थन नहीं दिया।

कुछ इलाकों में हल्की-फुल्की रुकावटें जरूर आईं, जैसे टायर जलाए गए, प्रदर्शन किए गए, लेकिन पुलिस ने समय रहते स्थिति संभाल ली। जो राजनीतिक नेता सड़कों पर उतरे, वे भी ज्यादा देर तक टिक नहीं पाए। आम लोगों की प्रतिक्रिया थी – “बंद से हमें क्या मिलेगा? रोज़ कमाने-खाने वाले लोगों को नुकसान ही होता है।”
दरअसल, यह बंद कुछ व्यापारिक संगठनों द्वारा भी समर्थन पाने की कोशिश में था। इनका कहना था कि GST की जटिलता और छोटे व्यापारियों पर आर्थिक बोझ बहुत बढ़ गया है। सरकार ने हाल ही में कुछ दरों में बदलाव किए हैं और छोटे व्यापारियों को “राहत” देने की बात कही है, लेकिन व्यापारियों का आरोप है कि यह सिर्फ दिखावा है — एक तरह का ‘लॉलीपॉप’ है, जिससे असल में कोई बड़ा फायदा नहीं हो रहा।
एक व्यापारी ने कहा, “GST सिस्टम अब भी बहुत उलझा हुआ है। रिटर्न फाइल करने में समय, पैसा और टेक्निकल दिक्कतें आती हैं। ऊपर से नोटिस और जुर्माने का डर हर वक्त बना रहता है। जो राहत दी गई है, वो सिर्फ कुछ प्रतिशत टैक्स कम करना है – असली दिक्कतें जस की तस हैं।”
बिहार के कई छोटे शहरों में किराना, कपड़ा और मोबाइल दुकानदारों ने ये भी कहा कि बंद बुलाने से पहले ज़मीनी स्तर पर व्यापारियों से बात ही नहीं की गई। ज्यादातर संगठन सिर्फ दिखावे के लिए काम कर रहे हैं, और छोटे व्यापारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि आज के समय में “बंद” जैसे हथकंडों का असर कम हो गया है। जनता अब ज़्यादा जागरूक हो चुकी है। उन्हें यह पता है कि एक दिन की बंदी से महंगाई नहीं घटेगी, टैक्स सिस्टम नहीं बदलेगा, और ना ही सरकार पर कोई गंभीर दबाव बनेगा। खासकर तब, जब बंद का नेतृत्व करने वाले खुद आपस में एकमत न हों।
सरकार की ओर से जो GST से जुड़ी राहत की घोषणाएं आई हैं, उनमें ई-वे बिल की शर्तों में थोड़ी ढील दी गई है, कुछ सेक्टर्स पर टैक्स कम किया गया है और कुछ प्रक्रियाओं को डिजिटल किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक GST का पूरा सिस्टम सरल और व्यावहारिक नहीं बनाया जाता, तब तक छोटे व्यापारियों को असली राहत नहीं मिलेगी।
बिहार में बंद फ्लॉप होने के बाद कई व्यापारिक संगठनों ने भी यह मान लिया है कि अब लड़ाई सिर्फ सड़कों पर नहीं, नीति के स्तर पर लड़नी होगी। इसके लिए सरकार से वार्ता, ठोस प्रस्ताव और तकनीकी समाधान की ज़रूरत है, न कि सिर्फ प्रदर्शन और मीडिया कवरेज।
आम जनता की भावनाएं भी अब बदल चुकी हैं। लोग चाहते हैं कि नेता और संगठन उन्हें समस्याओं का समाधान दें, सिर्फ नारे नहीं। एक राहगीर ने कैमरे के सामने कहा, “हर बार कोई नया मुद्दा लेकर बंद कर दो, दुकानें बंद करवा दो, रोड जाम कर दो – अब लोग थक चुके हैं। असली काम करना है तो संसद में आवाज उठाओ, कोर्ट में लड़ो, या फिर ऐसी नीति लाओ जिससे जनता को वाकई फर्क पड़े।”
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी – जनता अब सिर्फ नारों पर नहीं, काम पर भरोसा करती है। और अगर कोई सरकार या संगठन दिखावे की राजनीति करेगा, तो उसका जवाब जनता शांति से, लेकिन साफ तौर पर देगी – जैसे इस बिहार बंद में दिया।